मालवांचल में चार दिन

बात वर्ष 2015 के मई महीने की है। पंचायत चुनाव सम्पन्न हो चुके थे। समूचा चुनाव आयोग पश्‍चातवर्ती कर्तव्‍यों के निर्वहन में लगा हुआ था, मसलन व्ययों के लेखा परीक्षण, प्रतिवेदन तैयार करने, उपचुनावों की तैयारी आदि। विगत चुनाव में आयोग आई.टी. सम्बन्धी नवाचारों को बहुत सफलतापूर्वक आजमा चुका था। सफलता हमेशा कुछ और नया करने को प्रेरित करती है। वास्तव में हम सब एक सकारात्मक उर्जा के प्रभाव में थे और इस उर्जा के स्त्रोत थे, हमारे आयुक्त महोदय, जिनके सशक्त नेतृत्व ने सफल चुनाव संचालन के साथ-साथ आई.टी. के क्षेत्र में भी नए आयाम स्थापित किए हैं।

इसी क्रम में आयोग ने मतदाता सूची तैयार करने की व्यवस्था ऑनलाइन करने का निर्णय लिया और इसके लिए नगर पंचायत सुवासरा, जिला मंदसौर को पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया। इसकी निगरानी की जिम्मेदारी मिली हमारे अग्रज, श्री संजय श्रीवास्तव, डिप्टी कलेक्टर, पी-2013 को। मंदसौर निकलने के दो दिन पूर्व वे मेरे कमरे में आए, इधर-उधर की बातें कीं, फिर अचानक पूछ बैठे, संजीव! मेरे साथ तुम मंदसौर चलोगे क्या? मैं उन्हें मना तो कर नहीं सकता था परन्तु वरिष्ठों की अनुमति आवश्‍यक थी, जो उन्होंने बड़ी सरलता से प्राप्त कर ली। पहली ट्रेनिंग सोमवार के दिन सुबह थी, सो हम इतवार को ही दोपहर में निकल पड़े।

ऊपर प्रखर सूर्य चमक रहा था और गर्मी ऐसी, मानों सबको झुलसाकर ही मानेगी। हम लोगों ने इस हिसाब से अपनी तैयारी कर ली थी। हम देवास को कानपुर से जोड़ने वाली एन.एच. 86 पर तेजी से बढ़े जा रहे थे। नेट ऑन किया, गूगल मैप खोला, “भोपाल से मंदसौर 340 कि.मी. और दूरी तय करने में लगने वाला समय 5 घण्टा 36 मिनट”। मैंने कहा, असम्भव! पिछली बार तो ड्राइवर ने उज्जैन पहुँचने में ही 4 घण्टे से अधिक का समय लिया था। भोपाल-देवास कॉरीडोर के नाम से जानी जाने वाली यह फोरलेन सड़क वर्तमान में बहुत आरामदेह है। इसका स्थान सेन्ट्रल इण्डिया की बेहतरीन सड़कों में लिया जाता है। निर्माण चेतक इन्टरप्राइजेस ने किया है और आज वही इसे ऑपरेट भी कर रही है। टोल टैक्स के रूप में वह कुछ पैसे तो अवश्‍य लेती है, मगर इस सड़क पर सफर का आनन्द कुछ और है।

देखते ही देखते सीहोर को बायपास करते हुए हम आष्टा पहुँच गए। यह नगर पार्वती नदी के किनारे बसा हुआ है और इस नगर के समीप बना एक शिव मन्दिर 3500 वर्ष पुराना माना जाता है। कहते हैं कि बरसात के दिनोंण्‍ में इस पार्वती नदी का जल स्तर तब तक बढ़ता है जब तक कि यह इस मन्दिर में स्थापित शिवलिंग को स्पर्श नहीं कर लेता। जैन धर्मावलम्बी इस नगर को अतिश्‍य क्षेत्र कहते हैं।

आष्टा से आगे बढ़ते हुए हम सोनकच्छ पहुँचे। सोनकच्छ कालीसिन्ध नदी के किनारे बसा हुआ है। इसी जिले के बागली के पास से निकली इस नदी का पानी कभी बाढ़ के समय भोपाल-इन्दौर मार्ग को अवरूद्ध कर दिया करता था। नई सड़क ने इस समस्या के साथ-साथ रास्ते में पड़ने वाले समस्त शहरों की ट्रैफिक से भी निजात दिला दिया है। आधे घण्टे में हम देवास शहर के पास से गुजर रहे थे। देवी-देवताओं का वास होने के कारण इस नगर का नाम देवास पड़ा है। इस नगर के पास देवी वासिनी पहाड़ी है, जिसे लोग टेकरी के नाम से अधिक जानते हैं। इस पहाड़ी पर एक सिद्ध मन्दिर है जिसमें देवी तुलजा भवानी, चामुण्डा माता और माँ कालिका की दिव्य प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं। इस पहाड़ी के ऊपर दो मशहूर किताबें भी लिखी गई हैं। स्वामी शिवोम तीर्थ ने अपनी पुस्तक ‘साधन शिखर’ में इस टेकरी का इतिहास लिखा है जबकि ई.एम. फोस्टर्स ने वर्ष 1953 में एक चित्रात्मक यात्रा वृत्तान्त के रूप में ‘द हिल ऑफ देवास’ लिखी। दोनों पुस्तकें इस स्थान के बारे में दुर्लभ विवरण प्रस्तुत करती हैं।

देवास दो देशी रियासतों का प्रत्यक्ष गवाह रहा है। इसके राजा पवार वंश के मराठा सरदार थे और ब्रिटिश राज ने इन्हें ‘15 गन सैल्यूट’ का सम्मान दिया था। इस रियासत की नींव 18वीं सदी में दो भाइयों तुकोजी राव और जीवाजी राव ने रखी थी जो वर्ष 1728 में पेशवा बाजीराव के साथ इस क्षेत्र में आए थे। बाद में इस रियासत के दो टुकड़े हुए जिनके शासक जूनियर और सीनियर कहलाए। वर्ष 1841 के बाद दोनों भाइयों के वंशजों ने अपने-अपने हिस्सों पर स्वतन्त्र रूप से तब तक राज किया जब तक कि वर्ष 1947 में इस राज्य का भारत संघ में विलय नहीं हो गया।

इन ऐतिहासिक पन्नों के बीच से गुजरते हुए हम कब उज्जैन पहुँच गए, पता नहीं चला। हमारा ड्राइवर अरमान एक मस्त लड़का था और वह हमारी सेवा में हमेशा तत्पर रहा। घड़ी देखी तो मालूम पड़ा कि भोपाल से निकले हमें मात्र ढाई घण्टे हुए हैं। पिछली यात्रा के दौरान ड्राइवर से मिले इसी अनुभव के कारण हम आज पहले निकले थे ताकि मंदसौर अन्धेरा होते-होते पहुँच जाएँ। लगने लगा कि गूगल मैप सच बोल रहा है, हम ही नहीं मान रहे थे।

उज्जैन अब खूबसूरत शहर हो चला है। इस पवित्र नगर में सिंहस्थ 2016 की तैयारी अपने चरम पर है। इतने वृहद् पैमाने पर निर्माण कार्य और तैयारियों का आधार एक अनुमान है जिसके अनुसार सिंहस्थ 2016 में देशभर से करीब 5 करोड़ श्रद्धालु और लगभग 10 लाख साधु-सन्त आएंगे। 6 मई 2016 को शाही स्नान समेत 9 प्रमुख स्नान पर्व होंगे जो 22 अप्रैल से 21 मई तक चलेंगे।

ज्योतिषियों के अनुसार, अधिकांश पुण्यप्रद योग यथा- सोमवार, पूर्णिमा तिथि, शुक्ल पक्ष, वैषाख मास, स्वाति नक्षत्र, व्यतिपात, मेष राशि में सूर्य एवं तुला राशि में चन्द्र योग तो प्रतिवर्ष बन जाते हैं परन्तु सिंह राशि में वृहस्पति 12 वर्षों में एक बार ही आता है जो महाकुम्भ की पुण्य घटना को जन्म देता है। इसी योग के कारण उज्जैन के कुम्भ मेले को सिंहस्थ नाम दिया गया है। मैंने और संजय भाई दोनों ने निश्‍चय किया कि हम दोनों अगले वर्ष होने वाले इस दिव्य आयोजन के दौरान छुट्टियाँ लेकर एक माह यहीं प्रवास करेंगे। इसकी प्रेरणा हमारे वरिष्ठ श्री दीपक सक्सेना ने दी थी। यही चर्चा हम कर ही रहे थे कि हमारी कार क्षिप्रा नदी के रामघाट के पास से गुजरी। आज की तारीख में यह घाट बहुत सुन्दर और व्यवस्थित हो चुका है। स्वच्छ जल की धारा हमारी आँखों को शीतलता प्रदान कर रही थी। यह सब सम्भव हुआ, नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना के कारण।

एक महत्वाकांक्षी परियोजना के रूप में नर्मदा नदी का पानी 350 मीटर ऊपर लिफ्ट करने के बाद 49 कि.मी. लम्बी पाइपलाइन से गुज़ारते हुए क्षिप्रा नदी में प्रवाहित करने की योजना 14 माह के रिकार्ड समय में पूरी की गई। मैं और संजय भाई इसी की चर्चा में खो गए कि इसके किनारे बसने वाले गाँवों, वनस्पतियों और जलीय जीवन में किस प्रकार का परिवर्तन होना सम्भव है। इसे महसूस करने के लिए इस पवित्र किन्तु जलाभावग्रस्त नदी के किनारे-किनारे पदयात्रा करने की इच्छा ने जन्म ले लिया है। इस परियोजना को कुछ धर्मभीरू लोग नर्मदा-गंगा लिंक के रूप में भी देखते हैं। नर्मदा का पानी क्षिप्रा में, क्षिप्रा का चम्बल में, चम्बल का यमुना में और अन्त में यमुना नदी इस चिर कुँवारी पावन सलिला नर्मदा के जल को प्रयागराज के निकट माँ गंगा तक ले जाने का वाहक बनेगी।

करीब-करीब असम्भव कहलाने वाली इस परियोजना की सफलता से उत्साहित मुख्यमन्त्री महोदय ने नदी जोड़ो योजना के अगले चरण में नर्मदा को गम्भीर, कालीसिन्ध और पार्वती से जोड़ने की ओर कदम बढ़ाने की घोषणा की है। आष्टा में पार्वती और सोनकच्छ में कालीसिन्ध की दुर्गति हम देखकर ही आ रहे थे। संजय भाई भी इस परियोजना के बारे में भारी उत्साह में दिखे।

अब हम नागदा की ओर बढ़ रहे थे। उज्जैन से नागदा तक कुल 60 कि.मी. की दूरी हमने एक घण्टे में तय कर ली। कहते हैं, इस नगर का वास्तविक नाम नाग-दाह अर्थात् साँपों का अग्निदाह है। इस नगर को पाण्डवों के वंशज जनमेजय ने बसाया था। महाकवि कालिदास के ग्रन्थों में भी इस नगर का उल्लेख मिलता है। इस प्राचीन पौराणिक शहर की पहचान आज एक औद्योगिक नगरी में रूप में है जिसका श्रेय जाता है, प्रसिद्ध उद्योगपति और समाजसेवी घनश्‍यामदास बिड़ला को। भूमि की उपलब्धता और चम्बल नदी ने उन्हें ग्रेसिम इण्डस्ट्री लगाने के लिए प्रेरित किया। यहाँ एक बिड़ला मन्दिर भी है।

यहाँ के रेलवे स्टेशन को आई.एस.ओ. की प्रामाणिक गुणवत्ता प्राप्त है और एक रोचक तथ्य यह कि इस रेलवे स्टेशन से मुम्बई और दिल्ली दोनों की दूरी एक बराबर अर्थात् 694 कि.मी. है। नागदा से आगे निकलते ही हमें चम्बल नदी दिखी, ऐसी ही सूखी, जैसी पार्वती और कालीसिन्ध थीं। इस मालवा क्षेत्र के बारे में कभी कबीर ने कहा था –

‘‘मालव भूमि गहन गम्भीर।
पग पग रोटी डग डग नीर।।’’

सायं के साढ़े चार बज चुके थे, लेकिन हम कहीं रूके नहीं। हम अन्धेरा होने के पहले मंदसौर पहुँच जाना चाहते थे। करीब 45 मिनट में 42 किमी की दूरी तय कर हम जावरा में थे। जावरा रतलाम जिले में है। यह प्रसिद्ध हुसैन टेकरी के लिए जाना जाता है जहाँ मोहर्रम के अवसर पर हजारों लोग आते हैं। आजादी के पूर्व यह एक देशी रियासत हुआ करती थी जिसकी स्थापना एक अफगान अब्दुल गफूर मोहम्मद खान ने की, जो कभी पिण्डारी सरदार आमीर खान की अश्वसेना का एक सेनापति रहा था।

जावरा पहुँचने के बाद हम दाईं ओर मुड़ते हुए एन.एच. 79 पर आ गए जो अजमेर को इन्दौर से जोड़ती है। हम एक बार फिर फोरलेन रोड पर थे और मंदसौर अब मात्र 51 कि.मी. रह गया था जहाँ गूगल मैप के अनुसार 55 मिनट में पहुँचा जा सकता था। परिदृश्‍य एकदम बदल चुका था। अब हम राजस्थान की आबोहवा को महसूस कर सकते थे परन्तु क्षेत्र मालवा का ही था।

सड़क शानदार थी और उतनी ही आरामदेह भी। ऐसे में ड्राइवर द्वारा बजाए जाने वाले आज से करीब 20-22 वर्ष पुराने ‘नदीम-श्रवण’ युग के गीत। नदीम और श्रवण की जुगलबन्दी ने तब के युवा वर्ग को मोहब्बत करना सिखा दिया था। वे गीत वास्तव में मधुर थे। संगीत के लिहाज से 80 का दशक नीरस था और आनन्द-मिलिन्द के रजत-पटल पर आसीन होने के बाद ही फिल्म संगीत में मेलोडी का पुनर्आगमन हुआ। इसके बाद तो नदीम-श्रवण की जोड़ी ने धूम मचा दी थी। हमारी कार का ड्राइवर ऐसे ही सुपरहिट गाने बजा रहा था। आयोग में आने के बाद मैंने बहुत सारी यात्राएँ की हैं और इन यात्राओं में साथ रहने वाले युवा ड्राइवरों की पहली पसन्द यही गीत हैं। ऐसा मैं पक्के तौर पर कह सकता हूँ।

ऐसे में ही एक मशहूर गाने का कर्णप्रिय संगीत हमें झंकृत कर गया। गाना था कोशिश करके देख ले………….सोलह बरस की…..। मशहूर फिल्मकार एल.वी.प्रसाद की फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ की यह रचना मुझे एवं संजय भाई को चर्चा का एक और कॉमन एजेण्डा थमा गया। दरअसल यह गीत हम दोनों को समान रूप से प्रिय था। हम दोनों ही इस गीत के आध्यात्म की चर्चा में मशगूल हो गए। जिस प्रकार महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस के बाल खण्ड के प्रारम्भ में शिव वन्दना से ग्रन्थ की शुरूआत  की है, उसी प्रकार इस गीत के शब्दों की प्रारम्भिक अभिव्यक्ति उन स्थानों को सलाम करने सम्बन्धी भावों से हुई है, जहाँ ‘वे’ मिला करते थे। (धर्मप्रेमी बन्धु मुझ नादान को क्षमा करेंगे)

हम इस गाने की चर्चा में इतने तल्लीन हुए कि मंदसौर शहर में जाने के पहले वाले रास्ते को छोड़कर आगे बढ़ गए। मध्यप्रदेश पर्यटन निगम का ‘हाईवे रिट्रीट’ हमें गुजर जाने के बाद ही दिखा। सड़क की डिजाईन ऐसी कि हम पीछे नहीं लौट सकते थे। कुछ दूर आगे जाने के बाद हम दाईं ओर मुड़े और शहर के बीचो-बीच बने रास्ते को पार करते हुए सर्किट हाउस तक आ पाए। अन्धेरा होने के पूर्व मंदसौर पहुँचने का लक्ष्य हमने प्राप्त कर लिया गया था। सर्किट हाउस में हमें रिसीव करने के लिए जिला प्रशासन के अधिकारी मौजूद थे।

मंदसौर मैं दूसरी बार आया था। मुझे याद था कि पिछले भ्रमण के दौरान सुबह-सुबह टहलते समय सर्किट हाउस के पीछे बने एक घने वृक्षारोपण वाले क्षेत्र में चला गया था, जहाँ सैकड़ों मोर थे। यही चर्चा करते हुए मैं संजय भाई को वही सब कुछ दिखाने ले गया। मेरा अनुमान सही था, हमारी आहट पाते ही सैकड़ों मोर एक झटके में उड़ गए। बहुत आनन्दायी था, वह सब कुछ देखना। मुझे इस सर्किट हाउस का सबसे सुखद पक्ष यही लगा था। कल के प्रशिक्षण की चर्चा कर हमने अधिकारियों को मुक्त कर दिया। हमारे लिए रेतम कक्ष आरक्षित था। इस सर्किट हाउस के सभी कमरे नदियों के नाम पर हैं। इन्हीं में से एक कक्ष में मार्च 1954 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री जवाहरलाल नेहरू भी रूके थे, जब वे चम्बल नदी पर बने गाँधीसागर जलाशय का शिलान्यास करने आए थे। इस घटना का विवरण कमरे के सामने ठुंकी एक पट्टिका पर आज भी अंकित है।

करीब 350 कि.मी. की दूरी तय कर हम थक चुके थे। रात्रि में नींद तो अच्छी आनी ही थी। हाँ, सर्किट हाउस के खानसामा शरीफ ने स्वादिष्ट डिनर कराया।  

इस यात्रा खण्ड का आज प्रथम दिन था।  


दूसरा दिनः पशुपतिनाथ मन्दिर से सौन्घनी तक

सुबह उठने के बाद हमारा पहला कार्यक्रम पशुपतिनाथ मन्दिर का दर्शन था। 11 बजे से प्रशिक्षण-सत्र था जिसके पहले हम दर्शन कर लेना चाहते थे। हम जैसे ही तैयार हुए, महेन्द्र पटेल नाम के एक पटवारी का फोन आया, ‘‘आप लोग मन्दिर प्रांगण आ जाएं, मैं यहीं मिलूंगा’’। मन्दिर की दूरी सर्किट हाउस से मुश्किल से 1 कि.मी. थी जहाँ हम पांच मिनट में पहुँच गए।

यह भव्य मन्दिर, इस मंदसौर नगर की पहचान है। जहाँ तक मुझे याद है, इस नाम के दो ही प्रसिद्ध मन्दिर हैं, एक काठमाण्डू में तो दूसरा यहाँ मंदसौर में। ऐसी मान्यता है कि विश्‍व में केवल मंदसौर में ही अष्टमुखी शिवलिंग हैं। मुख्य द्वार पर ही पटवारीजी मिल गए। बहुत सम्मान के साथ उन्होंने इस महान् मन्दिर का दर्शन कराया। हमलोगों ने विधिवत पूजन किया, नारियल और दूध चढ़ाया, प्रसाद लिया और बाहर आने के बाद फोटोग्राफी भी की। वे बड़ी श्रद्धा से मन्दिर और उसकी महिमा के बारे में बताते रहे। शिवलिंग वास्तव में बहुत बड़ा और भव्य है। सैकड़ों श्रद्धालु मन्दिर प्रांगण में थे और आज दिन भी सोमवार था।

पटवारीजी ने मन्दिर के बारे में बहुत रोचक जानकारियाँ बताईं। इस मन्दिर की स्थापना को इस वर्ष बसन्तपन्चमी के दिन पूरे 54 वर्ष हो गए हैं। यह आयोजन 27 नवम्बर 1961 दिन सोमवार को स्वामी प्रत्यक्षानन्द महाराज के सान्निध्य में हुआ था। उसी पंचकुण्डात्मक महायज्ञ के साथ ही इस मन्दिर का नामकरण पशुपतिनाथ किया गया। कहते हैं, यह शिवलिंग सदियों से शिवना नदी की गर्भ में छुपा हुआ था। यह संयोग ही था जब वर्ष 1940 के जून महीने की 10 तारीख दिन सोमवार को नदी के घाट पर कपड़े धो रहे धोबी उदाजी पिता कालू फगवार को इस प्रतिमा के पहली बार दर्शन हुए। यह अष्टमुखी प्रतिमा किले की दक्षिण-पूर्व दिशा में चिमन चिश्‍ती की दरगाह के सामने रेत में दबी हुई थी। फिर यह 21 वर्षों तक तट पर ही पड़ी रही जिसकी देखरेख समाजसेवी शिवदर्शन अग्रवाल करते रहे।

मन्दिर दर्शन के बाद हमने शिवना नदी को देखा। मंदसौर के जनजीवन में इस नदी की बड़ी महिमा है। नदी की उत्तर दिशा में मंदसौर नगर बसा हुआ है जबकि इसके दक्षिणी किनारे पर यह मन्दिर स्थित है। कहते हैं, प्रत्येक बरसात में इस नदी का पानी बढ़ता है और एक समय इसका जलस्तर मन्दिर में प्रतिष्ठित शिवलिंग के पाँव अवश्‍य पखारता है। इस घटना को मंदसौर में धार्मिक अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है जिसे ‘जलाभिषेक’ कहते हैं। इस अद्भुत घटना के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए उस समय मन्दिर में भारी भीड़ उमड़ती है।

पटवारीजी ने बताया कि महाशिवरात्रि के दिन लाखों की भीड़ इकट्ठी होती है। मन्दिर एक विशाल और सुव्यवस्थित प्रांगण के मध्य में है जहाँ सुरक्षा व्यवस्था की तमाम व्यवस्थाएँ स्थाई रूप से की गई हैं। नदी के किनारे मन्दिर के स्थित होने के कारण यह 10 डिग्री तक झुक गया है बिलकुल पीसा की मीनार की तरह! यह और झुकता जा रहा है। अब तक टिके होने के कारण श्रद्धालु इसे भगवान शिव का चमत्कार मानते हैं।

इस मन्दिर के बारे में एक दन्तकथा है, करीब 1000 वर्ष पहले साधु इसे उड़ाकर लाए थे। काफी थक जाने के कारण वे मंदसौर में मन्दिर को रखकर आराम करने लगे। उस वक़्त इस स्थान पर काफी तान्त्रिक रहते थे। तान्त्रिकों ने इस मन्दिर को यहीं बाँध दिया, तब से यह मन्दिर यहीं स्थापित हो गया। जहाँ-जहाँ शिव मन्दिर हैं, वहाँ-वहाँ अंश मात्र ही सही परन्तु तान्त्रिक आध्यात्म अवश्य है।

पटवारीजी ने हमें पशुपतिनाथ मन्दिर प्रबन्ध समिति के सहायक प्रबन्धक श्री ओमप्रकाश शर्मा से भी मिलवाया। वे हमें अपने कार्यालय ले गए। ढ़ेर सारी जानकारियों के साथ मन्दिर के ऊपर लिखी एक पुस्तक भी दी। पन्ने पलटते हुए यह जानकर सुखद आश्‍चर्य हुआ कि इस पुस्तक की संपादकीय तत्कालीन मंदसौर कलेक्टर श्री मनोज श्रीवास्तव ने लिखी है जिसकी चर्चा मैंने बाद में उनसे भी की।

प्रशिक्षण का समय हो गया था। मन्दिर से हम सीधे जिला पंचायत सभा कक्ष पहुँचे। दो घण्टे सघन प्रशिक्षण सत्र चला। कल इस प्रशिक्षण का व्यावहारिक सत्र नगर सुवासरा में होना था, जिसकी व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करने के बाद हम लन्च के लिए वापस सर्किट हाउस आ गए। दोपहर में वहीं रूके रहे। सूर्य की प्रखरता कम होने के बाद हम यशोधर्मन का कीर्ति स्तम्भ देखने सौन्धनी के लिए निकल पड़े। 15 मिनट के अन्दर ही हम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित प्रांगण में थे।

इस सौन्धनी में दो विजय स्तम्भ हैं जिनमें से एक खड़ा हुआ बिलकुल सुरक्षित है जबकि दूसरा टूटा हुआ है जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सुरक्षित घेरे के अन्दर रखा है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, राजा यशोधर्मन औलिकर वंश के महान् राजा थे। इस वंश के राजा पाँचवीं सदी के मध्य में गुप्त साम्राज्य के सामन्त के रूप में शासन कर रहे थे। तब तक गुप्त साम्राज्य क्षीण हो चला था। इस साम्राज्य पर वाकाटकों और हूणों के लगातार हमले हो रहे थे, देश की दिशा और दशा अनिश्चितता के माहौल में थी और यह यशोधर्मन जैसे योग्य और महत्वाकांक्षी सामन्त के लिए आदर्श स्थिति थी।

मंदसौर के आसपास मिले यशोधर्मन के दो अभिलेखों (एक वर्ष 532 ई. का तथा दूसरे का समय ज्ञात नहीं) से उसके सैन्य विजयों की जानकारी मिलती है। इन सैन्य अभियानों का वर्णन अतिरंजित है। इनमें तो यह कहा गया है कि ब्रह्मपुत्र (लौहित्य) से महेन्द्र पर्वत (उड़ीसा के गन्जाम जिले) और हिमालय से पश्चिमी सागर तक उसका प्रभाव था। इस अभिलेख में उन प्रदेशों का भी वर्णन है जो कभी गुप्त राजाओं और हूणों के अधिकार में भी नहीं थे। फिर भी उसके विवरण काफी प्रभावशाली हैं। जैसे वह भारत के ऐतिहासिक मानचित्र पर देदीप्यान नक्षत्र की तरह व्याप्त हुआ और उसी की भाँति बिना स्थाई प्रभाव छोड़े तेजी से लुप्त भी हो गया।

अभिलेख में उसके द्वारा पराजित शत्रु के रूप में सिर्फ हूण राजा मिहिरकुल का उल्लेख मिलता है। यह महान् विजय उसे सम्भवतः गुप्त सम्राट नरसिंहगुप्त बालादित्य की मदद से मिली थी। इसी विजय को यादगार बनाने के लिए उसने सौन्धनी में कीर्ति स्तम्भ बनवाए थे। कहते हैं, नागप्पा और दासप्पा नाम के दो दक्षिण भारतीय कारीगरों ने दोनों प्रस्तर-स्तम्भों को आकार दिया था। सन् 1875 में ब्रिटिश अधिकारी सुलविन ने पहले स्तम्भ खोजा था जबकि दूसरे खण्डित स्तम्भ को खोजने का श्रेय जॉन एफ. फ्लीट को है। वर्ष 1921 में ग्वालियर पुरातत्व के डायरेक्टर वी.एस. गद्रे ने इन्हें एक चबूतरे पर स्थापित किया। तब से वे आज उसी स्थिति में हैं।

वहीं कुछ देर रूकते हुए वहाँ के चौकीदार से बातचीत की जो पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से नियुक्त 3 चौकीदारों में से एक था। उसके अनुसार, इस स्थान को देखने अधिक लोग नहीं आते। रामसेवक नाम का यह चौकीदार पहले हाण्डिया में पदस्थ था। वह हाण्डिया का ही निवासी है परन्तु मंदसौर की पदस्थापना के कारण बहुत दुःखी दिखा। अन्धेरा होते-होते हम वापस लौट चले।

अचानक संजय भाई को मंदसौर नगर देखने की इच्छा हो गई। वे तो इसे पोस्टिंग के हिसाब से टटोलने लगे। कहने लगे, यहाँ से उदयपुर बहुत पास में है। सारा शहर छान मारा। फिल्मों के शौकीन संजय भाई ने सभी टॉकीज तक देख डाले। अफीम की खेती के लिए विश्‍वभर में प्रसिद्ध इस नगर का प्राचीन नाम दशपुर है। महाभारत में यह दशार्ण क्षेत्र के नाम से जाना गया है। कुछ विद्वानों के अनुसार महाकवि कालिदास की जन्मभूमि यही दशपुर नगर है। बाण भट्ट ने अपनी प्रसिद्ध रचना कादम्बरी में इस नगर को दशपुर कहा है।

ऐसा माना जाता है कि इसी मंदसौर के नजदीक श्रवण नाले के किनारे दशरथ के बाण से अन्धे माता-पिता की एकमात्र सन्तान श्रवण कुमार की मृत्यु हुई थी। यहाँ एक खण्डित तोरणद्वार के एक स्तम्भ पर स्त्री-पुरूष एवं बालक की आकृति उत्कीर्ण है। इसे श्रवण कुमार और उसके माता-पिता माना गया है।

मंदसौर ठीक कर्क रेखा पर पड़ता है, इस कारण सूर्य की प्रखरता मन्द हो जाने के कारण इस नगर का नाम मंदसौर पड़ा। शोभित श्रीवास्तव जैसे कुछ लोग मंदसौर नगर के नामकरण के पीछे मन्दोदरी का मायका होना भी मानते हैं। उनके अनुसार, यह दशपुर भी रावण के दूसरे नाम ‘दशानन’ पर बसा है। परन्तु अधिक प्रामाणिक दावा इतिहासकार जॉन एफ. फ्लीट का है जिसके अनुसार दस ग्रामों यथा-खानपुरा, खाजपुरा, खिलचीपुरा, चन्द्रपुरा, मदारपुरा, नरसिंहपुरा, कागदीपुरा, जगतपुरा, डिब्बीपुरा एवं नयापुरा के कारण इसका नाम दशपुर पड़ा था।

इसी नगर में मंदसौर का किला भी है जिसे दशपुर किला कहते हैं। मालवा की स्वतन्त्र सल्तनत के संस्थापक और हुशंगशाह (जिनके नाम पर होशंगाबाद शहर है) के पिता दिलावर खान ने इसे पन्द्रहवीं सदी में बनवाया था। मंदसौर एक साथ-सुथरा परन्तु बड़ा शहर है। मालूम पड़ा, मंदसौर स्लेट की पेन्सिल का बड़ा उत्पादक है, इसे सफेद सोना कहा जाता है जबकि अफीम को काला सोना।

रात्रि 8:30 बजे तक हम सर्किट हाउस लौट आए थे। लौटकर रात्रि में हम दोनों ने महाभारत के कथानक पर आधारित लेखक देवदत पट्टनायक की पुस्तक ‘जय’ पढ़ी। संयोग देखिए, हम दोनों भोपाल से एक ही पुस्तक (अलग-अलग) लेकर आए थे। खाना खाने के बाद महाभारत की चर्चा करते-करते हमें नींद आ गई।

इस यात्रा खण्ड का आज दूसरा दिन था।


तीसरा दिनः शिवना नदी से क्षिप्रा नदी तक

सुबह तैयार होकर हमने फटाफट नाश्‍ता किया और कलेक्टर मंदसौर से मिलने निकले। पता चला कि वे अपने ऑफिस में ही बैठे हैं। चुनाव के सम्बन्ध में उनसे आधे घण्टे चर्चा हुई और शिवना नदी को प्रणाम कर वाया सीतामऊ, सुवासरा के लिए निकल गए। आज का हमारा कार्यक्रम नगर पंचायत सुवासरा में ऑनलाइन दावे/आपत्तियाँ प्राप्त करने सम्बन्धी प्रशिक्षण देना और चुनाव तैयारियों की समीक्षा बैठक लेना था। बहुत दिनों बाद वर्तमान में सीतामऊ के सबडिवीजनल मजिस्ट्रेट राजन बी.नाडिया से भेंट हुई। उनका मुख्यालय सीतामऊ था और उनके साथ ही सुवासरा जाने का कार्यक्रम नियत था। घण्टे भर में 60 कि.मी. की दूरी तयकर हम वहाँ पहुँच गए।

वर्ष 1947 में भारत की आजादी के समय जहाँ मंदसौर, ग्वालियर रियासत का अंग था, वहीं सीतामऊ, मालवा एजेन्सी के अन्तर्गत ‘11-गन सैल्यूट’ वाली एक स्वतन्त्र देशी रियासत थी। 15 जून 1948 को भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर के समय राजा राम सिंह शासन करते थे। ये राजपूतों की राठौर शाखा के वंशज थे।

पुरानी हिन्दी फिल्मों के मशहूर संगीतकार सज्जाद हुसैन ने वर्ष 1917 में इसी सीतामऊ की गोद में जन्म लिया था। इस महान संगीतकार की जन्मभूमि पर आकर एक सुखद अनुभूति हुई। मैंने श्री पंकज राग की किताब ‘धुनों की यात्रा’ में सज्जाद साहब के बारे में पढ़ा था। वो लिखते हैं “हिन्दी फिल्म जगत के यदि दो सबसे जटिल संगीतकारों का नाम लिया जाए तो सलिल चैधरी और सज्जाद हुसैन का नाम आएगा। एक जमाना था, जब उनकी रचनाओं को गाने के पहले बड़े-बड़े गायक-गायिकाओं की रूह काँपती थी। एक तो दुरूह रचना, इस पर उनका गुस्सैल स्वभाव। कहा जाता है कि एक बार वे लताजी से रिहर्सल करा रहे थे और किसी स्थान पर लताजी वैसा नहीं गा पा रही थीं, जैसा सज्जाद साहब चाहते थे। फिर तो बस, साहब! सज्जाद को गुस्सा आ गया और बोले, लताजी! ठीक से गाइए, यह नौशाद मियाँ का गाना नहीं है। नौशाद की यह हस्ती थी, सज्जाद के सामने”।

लेकिन रचनाओं की बात करें तो अन्तरात्मा श्रद्धा और आदर से भर जाएगी। फिल्म संगदिल का अमर गीत ये हवा ये रात ये चाँदनी, तेरी इक अदा पे निसार है…..। शब्दों की रूमानियत, तलत का संयत स्वर, तबले की थाप और सितार की झंकार ने इसे न पहुँचनेवाली हद तक पहुँचा दिया है। इस गाने के 17 रीटेक हुए परन्तु मरते दम तक वे इससे असंतुष्ट ही रहे। रूस्तम-सोहराब फिल्म के दो गीत फिर तुम्हारी याद आई ऐ सनम….. और ये कैसी अजब दास्तां हो गई है….. सुनकर आज भी कोई आत्मविभोर हो सकता है। पर मृत्यु के बाद सज्जाद के जनाजे में फिल्म जगत से मात्र खय्याम और पंकज उद्धास ही शामिल हुए। कहते हैं, फिल्म जगत जब किसी को भुलाता है तो पूरी क्रूरता से भुलाता है।

सीतामऊ में थोड़ी देर रूकने के बाद हम सभी सुवासरा के लिए रवाना हो गए। 32 कि.मी. की दूरी तय कर हम सीधे टप्पा कार्यालय पहुँचे। गहन प्रशिक्षण हुआ और हमने निर्वाचन की पुख्ता तैयारियों का जायजा लिया। वहीं रेस्ट हाउस में मालवा के मशहूर ‘दाल बाफले’ का आनन्द लेने के बाद हम धर्मराजेश्‍वर मन्दिर के लिए निकल पड़े।

रास्ते में शामगढ़ समेत कई छोटे-छोटे कस्बे पड़े। मंदसौर जिले में नगरीय निकायों की संख्या अधिक है। दरअसल ये छोटे-छोटे बाजार हैं जो आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को सेवाएँ देते हैं। समृद्ध बाजार, साफ-सफाई, लोगों के कारण रौनक, चमचमाती सड़कें इन कस्बों की विशेषताएँ थीं। शामगढ़ एक बड़ा रेलवे स्टेशन है जहाँ दिल्ली-मुम्बई को जोड़ने वाली करीब-करीब समस्त (राजधानी एक्सप्रेस को छोड़कर) ट्रेनें रूकती हैं। शामगढ़ से 22 कि.मी. बाद चन्दवासा आया, वहाँ से 4 कि.मी. बाएं मुड़ते हुए हम धमनार की पहाडि़यों पर आ गए। प्राचीनकाल में इन पहाडियों को चन्द्रगिरि के नाम से भी जाना गया है।

सुवासरा से निकलते वक्त एक पटवारीजी हम लोगों के साथ थे। इस कारण हमें वहाँ तक पहुँचने में कोई कष्ट नहीं हुआ। उसने हमें वहाँ के कर्मचारियों से मिलवाया। उसके बाद हम उनके मार्गदर्शन में धर्मराजेश्‍वर मन्दिर देखने निकले। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की मंदसौर सूची में दो प्राचीन स्थल दर्ज हैं –

(1) ब्राह्मण गुफा मन्दिर, धमनार और
(2) बौद्ध गुफाएँ, 1 से 51 तक धमनार, मंदसौर।

7वीं से 9वीं सदी के मध्य बना यह मन्दिर स्थापत्य कला की एक अलग विधा का चमत्कार है। हम जैसे ही नीचे उतरे, मन्दिर देखकर रोमांच से भर गए। इस मन्दिर की तुलना एलोरा के कैलाश मन्दिर से की जाती है क्‍योंकि कैलाश मन्दिर की ही भाँति यह मन्दिर भी एकाश्‍म शैली में निर्मित है जिसमें एक बड़ी चट्टान को खोखला कर एक देवालय में परिवर्तित कर दिया गया है। यह मन्दिर जितना विशाल है, उतना ही उत्कृष्ट और सुन्दर भी है। इस मन्दिर को बनाने के लिए 54 मीटर लम्बी, 20 मीटर चौड़ी और 9 मीटर गहरी चट्टान को तराश कर, बिना किसी जोड़ के, इसे 14.53 मीटर लम्बी और 10 मीटर चौड़े मन्दिर के रूप में ढाल दिया गया है।

हम सीढि़यों से उतरते हुए मन्दिर के द्वार पर पहुँचे। सतह से 9 मीटर नीचे उस मन्दिर प्रांगण में हमलोगों और मन्दिर के पुजारी के अलावे अन्य कोई भी नहीं था। दोपहर 2 बजे, 19 मई का दिन, ऊपर चिलचिलाती-झुलसाती धूप और 45 डिग्री सेल्सियस तापमान में और कोई आता भी क्‍यों? वह तो हम लोगों का पागलपन ही था, जो यहाँ तक आ गए। वैसे सुवासरा में सभी, हम लोगों के यहाँ आने के पहले धमका भी रहे थे। परन्तु यहाँ आने के बाद लगा कि हमने कुछ भी गलत नहीं किया है।

मन्दिर बहुत खूबसूरत था। मन्दिर की वास्तुकला भी उतनी ही उत्कृष्ट थी। सभामण्डप पार करते हुए हम गर्भगृह तक पहुँचे। गर्भगृह में एक शिवलिंग और विष्णु की एक मूर्ति दोनों ही थीं। पुजारीजी ने पूजा अर्चना में हमारी मदद की। बाहर निकलने पर छोटे-छोटे कई मन्दिर और थे। इतनी तेज धूप में ज्यादा देर ठहर पाना सम्भव नहीं था। ऊँची चट्टानों को काटकर बनाए गए रास्ते से गुज़रते हुए हम बाहर की ओर निकले। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, यह मन्दिर पाण्डवों द्वारा निर्मित है, जब वे वनवास के दौरान द्रौपदी के साथ यहाँ कुछ समय रूके थे। इस मन्दिर की ऐतिहासिक महत्ता का अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस मन्दिर के निर्माण का समय लगभग वही है, जब महाराष्ट्र में राष्ट्रकूट वंश के राजाओं ने एलोरा की गुफाओं को बनवाना शुरू किया था।

हम बाहर निकलकर पहाड़ी की दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में पहुँचे। इस हिस्से में लगभग 51 गुफाएँ बनी हैं, जिनमें गुफा नं. 12 सबसे बड़ी है, जिसे भीम-बाजार कहते हैं। इस गुफा में हम एक तरफ से घुसे और दूसरी ओर से बाहर आ गए। इस पूरे रास्ते दाईं ओर दुकानों की शक्ल में गुफाएँ खुदी हुई थीं। कई अन्य गुफाओं को देखने से मालूम पड़ा कि इन चैत्यालयों में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ हैं और बौद्ध प्रतीकों को भी उत्कीर्ण किया गया है। यहाँ बौद्ध धर्म से जुड़े स्तूप और अन्य स्मारक बौद्ध भिक्षुओं की शरणस्थली बताए जाते हैं। जहाँ धर्मराजेश्‍वर मन्दिर ठोस चट्टान से निर्मित है, वहीं ये समस्त गुफाएँ लैटेराइट चट्टानों पर खुदी होने के कारण खुरदरी और मुरमीली हैं। इतिहासकार फर्गुसन के अनुसार, ये गुफाएँ वर्ष 408 ई. से 475 ई. के मध्य बनी हैं। स्पष्ट है कि ये बौद्ध गुफाएँ, धर्मराजेश्‍वर मन्दिर से पुरानी हैं।

करीब डेढ़ घण्टा समय गुजारने के बाद हम ऊपर आए। वहाँ के कर्मचारियों ने चाय-पानी पिलाया और वहाँ के बारे में बहुत सारी बातें बताईं। तब तक कुछ ग्रामीण भी मन्दिर दर्शन हेतु पहुँच गए थे। कुछ देर तक हम उन्हीं से बातें करते रहे। यहाँ महाशिवरात्रि के दिन एक बड़ा मेला भी भरता है।

हम वापस लौटे। लौटते समय हम लोगों ने बहुत सारी पवन चक्कियाँ देखीं। ऐसी ही बहुत सारी पवन चक्कियाँ हमें भोपाल से इन्दौर आते समय देवास के पास नागदा की पहाडियों पर भी दिखती हैं। इनके बारे में जानने की उत्सुकता हमें एक के पास खींच लाई। प्रत्येक पंखा का एक स्वतन्त्र पवन उर्जा उत्पादक इकाई है। पास आकर ही पता चल पाया कि इनकी ऊँचाई इतनी अधिक होती है। हमें वहीं एक दक्षिण भारतीय इन्जीनियर मिल गया। उसने हमें विस्तार से समझाया। उसके अनुसार प्रत्येक पंखे की लागत 10.50 करोड़ रूपये आती है और इसकी उत्पादन क्षमता 2 मेगावाट है। प्रत्येक पंखे के पास बनाए गए एक एच.टी.आर. (हाई टेमपरेचर रिएक्टर) के बारे में भी बताया। उसके अनुसार, ये पवन चक्कियाँ सुजलान टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं और सी-वेट (Centre for Wind Energy Technology) द्वारा प्रोमोटेड हैं।

रास्ते में पानी से भरपूर चम्बल नदी दिखी। एकदम स्वच्छ जल, इस तपती दुपहरी में आँखों को शीतलता प्रदान कर रहा था। कहा जाता है, यह चम्बल नदी अपने पूरे 960 कि.मी. के प्रवाह-पथ के दौरान प्रदूषणरहित है। ऐसा कोई भी उद्योग इस नदी के किनारे नहीं है, जो इसे प्रदूषित करे। लेकिन यहाँ नदी में  इतना पानी है कैसे? नागदा में तो पूरी तरह सूखी हुई थी। बताया गया कि कुछ ही दूर आगे गाँधी सागर बाँध के कारण बैक वाटर का पानी भरा हुआ है।

पुल पर गाड़ी से उतरे और नदी को निहारते रहे। चम्बल का नाम आते ही, ‘चम्बल की कसम’ सहित न जाने कितनी फिल्में, चम्बल के बीहड़, चम्बल के डकैत, चम्बल के मगर और घडि़याल, चम्बल की डॉल्फिन्स, भिण्ड में अटेर का किला और न जाने कितनी ही स्मृतियाँ मानस पटल पर कौंध जाती हैं। संजय भाई से कहा कि फोटो शॉट होना चाहिए।

इन्दौर जिले के महू के पास सिंगार चौरी नाम की चोटी के पास से निकलने वाली इस चम्बल नदी का प्राचीन नाम चर्मावती है जिसका उल्लेख पुराणों के साथ-साथ महाभारत में भी आया है। महाभारत में इसकी उत्पति के बारे में कहा गया है कि आर्य राजा रन्तिदेव ने एक अग्निहोत्र यज्ञ सम्पन्न कराया था जिसमें हजारों पशुओं की बलि दी गई थी। मृत पशुओं के चर्मों का एक पहाड़ सा ढ़ेर लग गया था और इसी ढे़र से बहने वाले रक्तप्रवाह के कारण चर्मावती नदी का जन्म हुआ। यह एकमात्र नदी है जो मध्यप्रदेश की दो राज्यों राजस्थान (217 कि.मी.) और उत्तरप्रदेश (145 कि.मी.) के साथ भौगोलिक सीमाओं का निर्माण करती है। इसके सौन्दर्य को निहारते हुए हम आगे बढ़ चले।

सायं 5 बजे तक मंदसौर पहुँचे। सर्किट हाऊस में एक घण्टे के आराम के बाद ही उज्जैन के लिए निकल गए। कल वहाँ राज्य निर्वाचन आयोग, उज्जैन नगर निगम के चुनाव की तैयारियों की समीक्षा करने वाला था। मीटिंग में हमें भी उपस्थित होना था। 9:00 बजते-बजते हम उज्जैन में थे। वहीं सर्किट हाउस में डिनर लिया और IPL का पहला क्वालीफायर मैच देखा जिसमें मुम्बई इण्डियन्स ने चेन्नई सुपर किंग को आसानी से हराते हुए फाइनल के लिए क्वालीफाई कर लिया। 

इस यात्रा खण्ड का आज तीसरा दिन था।


चौथा दिनः महाकाल की शरण में

सुबह उठकर फटाफट तैयार हुए। साढ़े दस बजते-बजते सभी वरिष्ठ अधिकारी भोपाल से उज्जैन पहुँच चुके थे। वृहस्पति भवन, कलेक्ट्रेट, उज्जैन में चुनाव तैयारियों की समीक्षा बैठक हुई और पंचायत आम निर्वाचन में उत्कृष्ट योगदान करने वाले अधिकारियों का सम्मान समारोह भी सम्पन्न हुआ। दोपहर 1:00 बजे तक हम फुर्सत हो गए थे। अब हमारे पर आज के लिए कोई शासकीय कार्य शेष नहीं था। लेकिन उज्जैन आएँ और महाकाल के दर्शन न करें, ऐसा तो सम्भव नहीं था। जिला प्रशासन ने एक अधिकारी हमारी मदद के लिए हमारे साथ कर दिया था। थोड़ी ही देर में हम महाकाल मन्दिर प्रांगण में थे।

उज्जैन नगरी स्थित महाकाल 12 ज्योतिर्लिंगों में से शिव का तीसरा ज्योतिर्लिंग है। कहा जाता है कि जो महाकाल का भक्त है, उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। महाकाल की महिमा का वर्णन इस प्रकार से भी किया गया है –

आकाशे तारकं लिंग पाताले हाटकेश्‍वरम्।
भूलोके च महाकालो लिंगत्रय नमोस्तु ते।।

अर्थात् आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्‍वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्‍वर ये तीन ही मान्य शिवलिंग हैं।

महाकवि कालिदास ने अपनी महान् कृतियों रघुवंशम् और मेघदूत में महाकाल और उसके आकर्षण का वर्णन करते हुए उसकी संध्या आरती को अतुलनीय बताया है। कालिदास द्वारा इस मन्दिर के देदीप्यान विवरण को जिस विस्मयकारी अन्दाज में प्रस्तुत किया गया है, उसका प्रभाव चिरस्थाई रहा और महान् व्यक्तित्वों द्वारा जब भी मालवा अथवा उज्जैन के बारे में कुछ भी लिखा गया, इस मन्दिर की महिमा का विवरण शाश्‍वत रूप से उल्लिखित होता रहा। मेघदूत में कालिदास लिखते हैं कि जब स्वर्ग में निवास करने वाले जीवों में पुण्य का अंश कम होने लगा तो उनकी नियति पृथ्वी के साथ जुड़ गई। परन्तु पृथ्वी पर आने के समय अपने साथ स्वर्ग का एक खण्ड भी लेते आए, वही स्वर्गखण्ड आज उज्जयिनी नगर है। उनके मेघदूत के उज्जयिनी नगर का वैभव अब भले हुए कुन्द पड़ गया हो, परन्तु इसकी कीर्ति अभी भी वैसी ही है। इस मन्दिर में होने वाली आरती की गरिमा रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भी अविस्मरणीय लगी थी। तुर्क आक्रमण के पहले तक यह मन्दिर मालवा क्षेत्र के समस्त हिन्दुओं की आस्था एवं श्रद्धा का प्रमुख केन्द्र बना रहा।

महाकालेश्‍वर के बारे में जानने वाले समस्त श्रद्धालु एक कथा की चर्चा अवश्य करते हैं जो इस प्रकार है, अवन्ति नामक नगरी में पुण्य कार्य करने और वेदों के अध्ययन में लगा रहने वाला वेदप्रिय नाम का एक ब्राहम्ण रहता था। उसके चार संस्कारी पुत्र थे। उन दिनों रत्नमाला पर्वत पर दूषण नाम के एक असुर ने धर्मविरोधी कार्य प्रारम्भ कर रखा था। सबको नष्ट कर देने के बाद उसने भारी सेना लेकर अवन्ति पर चढ़ाई कर दी। अवन्ति के निवासी उस समय संकट में पड़ गए और कोई उपाय न सूझा, तो वेदप्रिय के चारों पुत्रों के साथ समस्त नगरवासी शिव उपासना में लीन हो गए। दूषण ने सोचा कि वे डरने वाले तो हैं नहीं, उन्हें क्यों न मार ही दिया जाए। वह जैसे ही आगे बढ़ा, उस समय शिवभक्तों द्वारा पूजित उस पार्थिवलिंग से अचानक विकट और भयंकर रूपधारी भगवान शिव प्रकट हुए और दुष्ट असुरों का संहार कर यहीं महाकाल के रूप में विख्यात हुए।

शिव ने अपने हुँकार से दैत्यों को भस्म कर उनकी राख को अपने शरीर पर लगा लिया था। तभी से महाकाल को भस्म लगाकर भस्म आरती की जाती है। भस्म शिवजी का प्रमुख आवरण है। शिवपुराण के अनुसार, भस्म सृष्टि का सार है, एक दिन सम्पूर्ण सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित हो जानी है। भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकडि़यों को एक साथ जलाकर, फिर कपड़े से छानकर तैयार किया जाता है। कहते हैं, पहले यहाँ चिताभस्म का उपयोग आरती के समय किया जाता था परन्तु महात्मा गाँधी के आग्रह के पश्चात् शास्त्रीय विधि से निर्मित उपलभस्म से आरती होने लगी है। भस्म आरती के अतिरिक्त, इस मन्दिर में तान्त्रिक परम्परा का दूसरा साक्ष्य इसके द्वार का दक्षिणमुखी होना है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से मात्र इसी मन्दिर में ऐसा है।

गर्भगृह की ओर जाते समय दाईं ओर एक छोटा सा तालाब रूद्रसागर, जिसे कोटितीर्थ भी कहते हैं, का पानी अब हरा हो चुका है। शायद क्षिप्रा नदी के पुनः जीवित होने से इसमें कोई अन्तर पड़े। लोग बताते हैं कि तुर्क सुल्तान इल्तुतमिश ने इस मन्दिर को तुड़वा कर इसका शिवलिंग इसी जलक्षेत्र में फिंकवा दिया था। बाद में भी इस मन्दिर पर लगातार हमले होते रहे जब तक कि मालवा पर बाज बहादुर सत्तासीन नहीं हो गया। अकबर के समय इस मन्दिर में कुछ पुनर्निर्माण के कार्य प्रारम्भ हुए। इसकी शुरूआत उज्जैन की सुरक्षा के लिए एक मजबूत दीवार के निर्माण से हुई तब इसके चारों ओर नन्दी दरवाजा, कलियादाह दरवाजा, सती दरवाजा, देवास दरवाजा और इन्दौर दरवाजा बनाए गए थे।

अपनी धर्मान्धता के लिए कुख्यात औरंगजेब ने इस मन्दिर को अनुदान के रूप में बहुत कुछ दिया है। इसके लिखित प्रमाण मन्दिर के पुजारियों के पास सुरक्षित हैं। उसने दारा शुकोह के गुरू कवीन्द्राचार्य सरस्वती की गोपनीय सुरक्षा के लिए फरमान भी जारी किया था, जिस दारा शुकोह को उसने अपना बड़ा भाई होने के बावजूद दिल्ली की गद्दी के लिए मार डाला था। ये सारे तथ्य कवीन्द्राचार्य द्वारा हस्ताक्षरित पाण्डुलिपियों में आज भी ढूंढे जा सकते हैं जो उज्जैन स्थित सिन्धिया ओरिएन्टल इंस्टीट्यूट में रखी हुई हैं।

करीब 4500 वर्ष पुराने इस मन्दिर का वैभव और प्राचीन धार्मिक परम्‍पराएँ तब तक प्रायः क्षीण हो चुकी थीं। इस मन्दिर का गौरव तभी बहाल हो सका, जब 29 नवम्बर 1728 को मराठों ने इस क्षेत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। मराठों के शासनकाल में यहाँ दो महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं। एक, महाकालेश्‍वर मन्दिर का पुनर्निर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा दो, सिंहस्थ पर्व की स्थापना। हिन्दू धर्म संस्कृति में यह एक बड़ी घटना के रूप में याद किया जाता है।

आज महाकाल मन्दिर जिस स्वरूप में है, उसका निर्माण बाजीराव पेशवा के सेनापति राणोजी सिन्धिया ने उनके मुनीम रामचन्द्र बाबा शेण बी की देखरेख में करवाया था। बाद के निर्माण और विकास में महादजी सिन्धिया और महारानी बायजाबाई राजे सिन्धिया ने भी अपना योगदान दिया। सन् 1731 से 1809 तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। बाद में सन् 1810 में सिन्धिया राजाओं की राजधानी ग्वालियर ले जाई गई। फिर भी वर्ष 1886 तक सिन्धिया राजपरिवार के समस्त बड़े आयोजन इसी मन्दिर प्रांगण में होते रहे।

हम सीधे गर्भगृह पहुँचे। चाँदी के सर्प से लिपटा हुआ बड़ा सा शिवलिंग, तीन तरफ दीवारों पर उनका पूरा परिवार, हर-हर महादेव और मन्त्रोच्चार से गूँजता हुआ शिवालय, शिवलिंग को पूरी आस्था से स्पर्श करते श्रद्धालु, ऐसे ही विशुद्ध धार्मिक वाङ्मय में हमने भी पूजन किया। हमारे साथ रहे कर्मचारी हमें मन्दिर के बारे में बताते रहे। यह मन्दिर तीन खण्डों में बंटा हुआ है। निचले खण्ड में महाकाल, बीच के खण्ड में ओंकारेश्‍वर महादेव तथा सबसे ऊपर वाले खण्ड में नागचन्‍द्रेश्‍वर के शिवलिंग प्रतिष्ठित हैं। नागचन्‍द्रेश्‍वर का दर्शन वर्ष के मात्र एक दिन नागपन्चमी को ही हो सकता है।

उस समय मन्दिर में भारी भीड़ थी। हम बाहर आए। कुछ देर तक मन्दिर प्रांगण को देखते, समझते रहे। हमारे साथ गाइड के रूप में जो व्यक्ति था, वह मन्दिर प्रबन्ध समिति का ही कर्मचारी था। उसके अनुसार, वर्ष 1968 के सिंहस्थ के समय मन्दिर का विशाल मुख्य द्वार बनाया गया। इसी समय निकासी के लिए भी एक पृथक द्वार बना था। तब तक सिंहस्थ में भारी भीड़ उमड़ने लगी थी। वर्ष 1980 के सिंहस्थ के समय बिड़ला समूह ने धर्मार्थ एक विशाल सभामण्डप बनवाया।

आजादी के पहले इस मन्दिर की व्यवस्था देख रहे देवस्थान ट्रस्ट का स्थान नगर निगम ने अपने हाथों में ले लिया था परन्तु वर्तमान में इस मन्दिर की व्यवस्था कलेक्ट्रेट करता है और महाकाल प्रशासक के रूप में एक डिप्टी कलेक्टर की नियुक्ति होती है। हाल ही में इसके 118 शिखरों पर 16 किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है।

महाकालेश्‍वर मन्दिर के विषय में मान्यता है कि महाकाल के भक्तों को मृत्यु और बीमारी का भय समाप्त हो जाता है और उनके यहाँ आने से अभयदान मिलता है। महाकाल उज्जैन के राजा हैं और सदियों से इसकी रक्षा कर रहे हैं। यह सब सुनते हुए हम विनायक मन्दिर के पुजारी से रेशम का विशेष रक्षासूत्र बँधवाने पहुँचे।

ऊँ महाकाल महाकाय, महाकाल जगत्पते।
महाकाल महायोगिन् महाकाल नमोस्तुते।।

और “येन बद्धो बलिराजा……… का मन्त्र बुदबुदाते उसने हम सबको रक्षासूत्र बाँधा। बाद में हमने भगवान को भोग लगाया हुआ प्रसाद भी खरीदा। इस यात्रा का उद्देश्‍य पूरा हो चुका था। वापस सर्किट हाऊस में दोपहर के लन्च के बाद हम भोपाल के लिए रवाना हो गए।

उज्जैन से भोपाल तक पहुँचने में हमें तीन घण्टे लगने वाले थे। परन्तु अभी भी दो प्रश्‍न आध्यात्मिक तर्क-वितर्क के लिए शेष रह गए थे। पहला हरिद्वार, प्रयाग और नासिक में लगने वाले मेले, कुम्भ कहलाते हैं परन्तु यहाँ सिंहस्थ नाम क्यों आया? दूसरा, उज्जैन स्थित शिव के ज्योतिर्लिंग मन्दिर के लिए प्रयुक्त होने वाला नाम ‘महाकाल’ कैसे पड़ा? दरअसल इसकी चर्चा वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक में भी आई थी। सिंहस्थ क्‍यों कहा जाता है, इसकी चर्चा पूर्व में हम कर चुके हैं। वास्तव में कुम्भ के लिए आवश्‍यक योग तो प्रतिवर्ष आते हैं परन्तु सिंह राशि में गुरू की स्थापना 12 वर्षों में एक बार होने से सिंहस्थ, कुम्भ का योग बनता है।

दूसरा प्रश्‍न पेचीदा है, जिसका कोई एक उत्तर हो सकता। कहीं उद्धृत है कि इस शिव मन्दिर के आसपास वाले वनक्षेत्र को कभी महाकाल कहा जाता था। दूसरा उत्तर धर्मसम्मत है। यह ब्रह्माण्ड तीन खण्डों में है। ऊपर आकाशलोक, यहाँ पृथ्वीलोक और नीचे पाताललोक। भगवान शिव को पृथ्वी और मृत्यु का देवता कहा गया है। मृत्यु और काल समानार्थी शब्द हैं। यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है, तो महाकालेश्‍वर नाम इसी कारण पड़ा।

तीसरा तर्क सूर्यसिद्धान्त को लेकर है। उज्जैन कर्क रेखा पर पड़ता है। भारत के प्राचीन खगोलशास्त्री, उज्जैन को विश्‍व का केन्द्र बिन्दु मानते हुए इसी स्थान से समय की गणना करते थे, जिस प्रकार आज ग्रीनविच से इसकी गणना होती है। यह रेखा उज्जैन और रोहतक से गुजरती थी। रोहतक, जहाँ कुरूक्षेत्र है और मकर संक्रान्ति का सबसे पुण्य स्नान यहीं का मान्य है। कहते हैं, उन दिनों उज्जैन में सूर्योदय से ही सारे विश्‍व में दिन की प्रारम्भ माना जाता था। ये सारे तथ्य खगोल विज्ञान के प्रसिद्ध ग्रन्थ सूर्यसिद्धान्त में दर्ज हैं, जिसे ग्रीक ग्रन्थों में भी अनेक बार उद्धृत किया गया है। यह सूर्यग्रन्थ यहीं उज्जैन में लिखा गया था।

चौथा तर्क, उज्जैन स्थित वेधशाला के साथ जुड़ा हुआ है। 18 वीं सदी में, जयपुर के राजा जयसिंह ने कुल पाँच जन्तर मन्तर बनवाए, दिल्ली, जयपुर, मथुरा, बनारस और उज्जैन में। उज्जैन की वेधशाला सन् 1725 से 1730 के मध्य बनकर तैयार हुई। इसमें एक शंकु यन्त्र भी तैयार किया गया है। कहते हैं, यह यन्त्र पृथ्वी के केन्द्र में लगाया जाता है, जहाँ से खगोलीय गणनाएँ अर्थात् काल की गणना की जाती है।

सम्भव है, कुछ और तर्क भी हों, परन्तु अपनी जानकारी में नहीं है। कुल मिलाकर विद्वानों में महाकाल नाम को लेकर मतैक्य नहीं है। अधिक प्रामाणिक दावा भगवान शिव को संहार का देवता माने जाने वाली मान्यता के कारण ही है।

इस चर्चा और अरमान द्वारा बजाए जाने वाले मधुर गीतों के कारण ये तीन घण्टे यूं ही गुजर गए। पूरे रास्ते बिजली कड़कती रही मगर बारिश तो भोपाल पहुँचने पर ही देख पाए। अन्धेरा होते-होते हम भोपाल पहुँच गए थे।

और इस प्रकार संजय भाई के साथ हमारी पहली यात्रा सम्पन्न हुई। पूरी यात्रा के दौरान बड़े भाई के रूप में उनका स्नेह और संरक्षण प्राप्त होता रहा। वे वास्तव में संजीदा किस्म के जहीन इन्सान हैं। उनके साथ तवाफ-ए-मध्यप्रदेश की आरजू हमेशा बनी रहेगी