
हम जेट एयरवेज की फ्लाइट 9 डब्ल्यू 0260 से नई दिल्ली से काठमाण्डू रवाना हुए थे। पूरा विमान छुट्टियाँ मनानेवाले पर्यटकों से भरा हुआ था। हमारा विमान इन्दिरा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़कर अमरोहा और लखनऊ के बीच से गुजरते हुए काठमाण्डू की ओर बढ़ रहा था जिसे हम सामनेवाली सीट के पीछे लगी स्क्रीन पर स्पष्ट रूप से देख पा रहे थे।
नई दिल्ली से काठमाण्डू की हवाई दूरी मा़त्र 507 कि.मी. है और दूरी तय करने में लगने वाला समय 1 घण्टे 15 मिनट। परिचारिकाओं ने लन्च के बाद सामान समेटा ही था कि फ्लाइट कैप्टेन श्री बख्शी की आवाज गूँजी “हम शीघ्र ही त्रिभुवन हवाई अड्डे पर लैन्ड करनेवाले हैं और बाहर का तापमान 18 डिग्री से॰ है”। उद्घोषणा को सुनकर सुखद अनुभूति हुई क्योंकि भारत में इस समय हम 44 डिग्री से॰ से 45 डिग्री से॰ के बीच तप रहे थे। वास्तव में हम आम भारतीय, जिन्हें थोड़ा बहुत पर्यटन का शौक है, इसी मानसिकता के साथ इन पहाड़ों के पास भागते हैं। गर्मी के दिनों में इन कम तापमानवाले स्थलों को छोड़ कर हम जा भी कहाँ सकते हैं? जाने के बाद इन पर्यटनस्थलों पर उमड़ी हुई भीड़ को देखकर लगता है कि ये सभी हमारी पीड़ा से ही पीडि़त हैं। यह भी सही है कि बच्चों की लम्बी, घूमने लायक छुट्टियाँ भी इसी समय उपलब्ध हो पाती हैं।
सच कहूँ तो इस बार हमारी मन्जिल नेपाल न होकर डलहौजी और धर्मशाला थी। इसके लिए हमने पर्याप्त तैयारी भी कर ली थी। अपनी इस मंशा को दोस्तों, मित्रों से साझा भी कर लिया था। परन्तु जैसा कि अक्सर होता है, हमारी नियति देश, काल, परिस्थितियाँ ही तय करती हैं। ट्रेन के टिकट के अभाव में हमें, अपना गन्तव्य परिवर्तित करना पड़ा। नेपाल जाने का हमारा कार्यक्रम प्रस्थान के मात्र दो दिवस पूर्व ही अन्तिम रूप ले पाया था। हमारी पैकिंग तो पूर्व से चल ही रही थी परन्तु नेपाल के बारे में हमारे पास कोई ट्रैवल गाइड नहीं था। बहुत ढूंढने के बाद लोनली प्लेनेट की एक किताब मिल पाई जिसे मैंने उस रात जागकर पढ़ा था।
पिछला लम्बा अरसा नेपाल में राजनैतिक उठापटक का रहा है। लेकिन अब अमन की नई उम्मीदों के बीच एवरेस्ट की इस धरती का सौन्दर्य मानो सबको फिर से अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। सारी दुनिया को नेपाल अपनी बेदाग खूबसूरती और बेपनाह सौन्दर्य के बल पर हमेशा से लुभाता रहा है। पुराणों के अनुसार नेपाल और भारत दोनों, सगी बहनें हैं और इन दोनों देशों का रिश्ता, सदियों पुराना है। हिन्दू धर्म में अगाध आस्था रखनेवाले नेपाल, भारत और अन्य राष्ट्रों में रह रहे विश्व के धर्मावलम्बियों के लिए नेपाल एवं पशुपतिनाथ मन्दिर परम पूज्य हैं। नेपाल और भारत के बीच मैत्री, बहुत पुरानी और प्रगाढ़ है। भले ही राजनैतिक दृष्टि से ये दो राज्य हों, परन्तु दोनों देशों के लोग आपस में सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं धार्मिक बन्धनों में गुंथे हुए हैं। इन आयामों के आधार पर, दोनों देशों को पृथक करना असम्भव है। यदाकदा क्षणिक आवेगों को छोड़ दें तो दोनों देशों के मध्य व्यापक वैचारिक मतभेद नहीं हैं।
दन्तकथाओं के अनुसार नेपाल एक हिन्दू ऋषि ने की कर्मभूमि रही है। इन्हीं नेमुनि के कारण इस क्षेत्र का नाम नेपाल पड़ा। स्कन्दपुराण और पशुपतिपुराण में इसका उल्लेख आया है। स्कन्दपुराण में तो नेपाल महात्म्य के नाम से एक पृथक अध्याय ही है। आज भी नेपाल के अधिकांश क्षेत्रों में शीर्ष पुजारियों को तीर्थगुरू नेमुनि नाम से पुकारा जाता है।
किरात समुदाय यहाँ रहनेवाले प्रथम लोग थे। बाद में, बिहार के मिथिला क्षेत्र में शासन करनेवाले लिच्छवियों का इस क्षेत्र में वर्चस्व हो गया था। लिच्छवियों के साथ ही इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्राबल्य स्थापित हुआ। नेपाल में खुदाई में प्राप्त वर्ष 185 के अभिलेख काठमाण्डू घाटी को 1992 वर्ष पुराना बताते हैं। किम्वदन्तियों के अनुसार अशोक महान् की पुत्री चारूमती ने इस क्षेत्र में पाटन शहर के चारों कोने में चार स्तूप बनाकर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। 11वीं सदी के उत्तरार्द्ध में दक्षिण भारत से आए चालुक्यवंशी लोगों का प्रभाव नेपाल के दक्षिणी भू-भाग में हुआ। चालुक्यों के प्रभाव में आकर उस समय के राजाओं ने बौद्ध धर्म छोड़कर हिन्दू धर्म का समर्थन किया और नेपाल में धार्मिक परिवर्तन की शुरूआत हुई।
इसके बाद मल्लवंश का प्रभाव पूरे नेपाल में तब तक रहा जब तक कि वर्ष 1768 में राजा पृथ्वीनारायण शाह ने, काठमाण्डू घाटी जीतकर नेपाल का एकीकरण नहीं कर दिया। एकीकरण की इस घटना को आधुनिक नेपाल का जन्म कहते हैं। नेपाल भारतवर्ष का एकमात्र खण्ड है जो कभी किसी अन्य देश के अधीन नहीं रहा। बाद में शाह राजाओं ने सिक्किम सहित वर्तमान भारत के बहुत बड़े भू-भाग पर कब्ज़ा कर लिया था परन्तु अंग्रेज़ों के साथ युद्ध में हुई हार के बाद, वर्ष 1815 में सुगौली की सन्धि हुई। इस सन्धि में नेपाल को ये सारे क्षेत्र त्यागने पड़े थे और नेपाली सैनिकों की वीरता और युद्धकौशल को देखते हुए इस सन्धि में अंग्रेज़ों ने इन सैनिकों की भर्ती का अधिकार भी प्राप्त किया था।
नेपाल यात्रा हमारे लिए पहली बार नहीं थी। इसके पूर्व दो बार मैं जा चुका हूँ। मुझे याद है 18 वर्ष पूर्व ही घटना। मेरा विवाह 24 मई 1996 को सम्पन्न हुआ था। मेरी उम्र पर्याप्त थी और दो-ढाई वर्ष नौकरी भी कर चुका था। फिर भी मैं डर रहा था अपनी पत्नी के साथ, कहीं बाहर घूमने जाने को लेकर। मेरे परिवार में मुझसे बड़ा भाई होने के कारण मैं अक्सर पारिवारिक जिम्मेदारियों से बच जाया करता था। धीरे-धीरे किसी भी दायित्व से बचना मेरी आदत बन गई थी। इसी क्रम में विवाह के बाद कहीं घूमने जाना नहीं चाहता था। बड़े भाई की जिद्द के कारण ही किसी प्रकार काठमाण्डू और पोखरा जाने को तैयार हुआ। मैं उसका आदेश टाल नहीं सकता था। मेरा बड़ा भाई मेरे लिए आदर्श रहा है। पूरी जिन्दगी मैं उसके जैसा बनने की कोशिशें करता रहा इस दृढ़ विश्वास के साथ कि उसके जैसा कभी बन नहीं सकता। आज मुझसे वह बहुत दूर केनबरा में है परन्तु मेरे लिए वह प्रातःस्मरणीय है। उसके साथ मेरे दोस्ताना सम्बन्ध मेरे लिए धरोहरस्वरूप हैं और इसे मैं किसी के साथ साझा नहीं कर सकता।
दोपहर में ठीक डेढ़ बजे हमारा विमान त्रिभुवन अन्तराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर लैन्ड कर चुका था। विमान से निकलने के बाद ताजी हवा ने हमारे अन्दर स्फूर्ति भर दी। हम 45 डिग्री से॰ के अत्याचार से अल्प समय के लिए ही सही, बाहर आ चुके थे। आव्रजन औपचारिकताओं को पूरा करते हुए गेट तक आए ही थे कि हवाई अड्डे पर तैनात एक अधिकारी ने हमारा पासपोर्ट माँगा। हमारे दिखाने पर उसके भावपूर्ण प्रत्युत्तर -आप संजीव पाण्डेय हो, मैं भी पाण्डेय हूँ, ओम प्रकाश पाण्डेय- ने माहौल में अनौपचारिकता के भाव घोल दिए थे। वास्तव में नेपाल पहुँचकर हमें लगा ही नहीं कि हम किसी दूसरे देश में हैं। काठमाण्डू, हमें भारत का ही एक अन्य शहर प्रतीत हुआ। सुरक्षा जाँच काफी चुस्त और व्यापक तरीके से कई चरणों से गुजरते हुए पूरी हुई। कन्वेयर बेल्ट से बैगेज उतारकर हम गेट की ओर बढ़े तो बोर्डिंग पास में चिपकी रसीद के साथ बैगेज में लगे स्लिप के नम्बर का मिलान किया गया। सही होने पर ही आगे बढ़े। ऐसा भारत के हवाई अड्डों पर नहीं होता।
इस विमानक्षेत्र का नाम आरम्भ में गौचर विमानक्षेत्र था जब वर्ष 1949 में एक फोरसीटर विमान, बीचक्राफ्ट बोनान्जा, उतरा था। यह यहाँ उतरनेवाला पहला विमान था जिसमें एक भारतीय राजदूत सवार थे। वर्ष 1955 में विधिवत विमान सेवा की शुरूआत महाराजा महेन्द्र ने की और इसका नाम बदलकर त्रिभुवन विमानक्षेत्र कर दिया गया। बाहर निकलकर हम भारत से पूरी तरह कट जाते यदि हमने कोई वैकल्पिक व्यवस्था न की होती। हमने एक सिमकार्ड लिया और उसे रिचार्ज कराया। ऐसे अनेक स्टॉल वहाँ थे और तकरीबन समस्त पर्यटक ऐसा कर रहे थे।
हवाई अड्डे से बाहर आने के बाद मैंने अपने नाम का प्लेकार्ड ढूंढा। हेरिटेज टूर एजेन्सी के मैनेजर श्री किशोर वहाँ स्वयं मौजूद थे। सामान्य औपचारिक अभिवादन के बाद उन्होंने हमारे टूर कार्यक्रम का पूरा ब्यौरा दिया और व्हाउचर्स सौंपे। उसके बाद एक वाहन से हम होटल की ओर रवाना हुए। अगले दिन सुबह हमें माउण्टेन फ्लाइट के लिए जाना था। रास्ते में हमें इसके टिकट भी उपलब्ध करवाए गए। हमारा होटल रामा इन. दरबार एरिया में था। लगभग आधे घण्टे हम होटल में रुके। दोपहर का खाना हमने विमान में ही ले लिया था। हाथ मुँह धोने और फ्रेश होने के बाद एक अन्य वाहन हमें बौद्धनाथ स्तूप ले जाने के लिए बाहर तैयार खड़ा था। 15 मिनट की यात्रा कर हम स्तूप के सामने थे। ड्राइवर ने हमें टिकट दिलाकर मेनगेट पर छोड़ा। हम दक्षिणी द्वार से अन्दर घुसे।
बौद्धनाथ
बौद्धनाथ एशिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप है और काठमाण्डू में आए पर्यटकों का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटन केन्द्र भी। इस स्तूप के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ बना है। सैकड़ों बौद्ध भिक्षु और श्रद्धालु घड़ी की दिशा में स्तूप की परिक्रमा कर रहे थे। प्रदक्षिणा पथ, जो पकी हुई ईंटों का बना है, अब घिस गया था। यह तिब्बती बौद्धों का पवित्रतम स्थल है। नेपाली भाषी इसे बौधनाथ कहते हैं। पूर्ण रूप से सफेद रंग से पुता हुआ यह स्तूप वर्ष 1979 से यूनेस्को के विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित है।
मुख्य द्वार से प्रांगण में हम प्रवेश ही कर पाए थे कि अचानक तेज वर्षा प्रारम्भ में हो गई। प्रदक्षिणा करनेवाले अधिकांश लोगों के पास छाते अथवा रेनकोट थे। जिनके पास बचाव के साधन नहीं थे वे भागकर आसपास की दुकानों में घुस गए। हमने भी एक सी.डी., डी.वी.डी. की दुकान में आश्रय पाया। उस दुकान में भक्ति संगीत की मधुर स्वरलहरियाँ वातावरण में अजीब सा सम्मोहन घोल रही थीं। यह एक बौद्ध मन्त्रोच्चार था जो हमें नेपाल भ्रमण के दौरान कई स्थानों पर सुनने को मिला। वास्तव में, यह संगीत उच्च कोटि का था और इसे तैयार करनेवाला रचनाकार निश्चय ही संगीत की सभी विधाओं में पारंगत होगा।
तेज बारिश के दौरान उसी दुकान में एक बौद्ध भिक्षु से मेरी बातचीत हुई जो हिन्दी बोल और समझ पा रहा था। वह मूलतः तिब्बत का रहनेवाला था जिसका परिवार 1950 में तिब्बत पर चीनी आक्रमण के बाद भारत आ गया था। उसने बताया कि इस 40 मीटर व्यासवाले स्तूप में कश्यप बुद्ध की अस्थियाँ दफन हैं। यह स्तूप पाँचवीं सदी का है और बाद में पद्मसम्भव (रिनपोचे) के समय इस स्तूप का और विस्तार किया गया। तिब्बती ग्रन्थों के अनुसार इसका निर्माण एक देवता की पुत्री द्वारा किया गया है जिसने इस पृथ्वी पर मानव के रूप में जन्म लिया था जबकि नेवार ग्रन्थ बताते हैं कि लिच्छवी राजाओं ने वर्षा का आह्वान करने के लिए इसका निर्माण करवाया जब घाटी में अकाल पड़ा हुआ था।
इस स्तूप के निर्माण की कई दन्तकथाएँ प्रचलित हैं। इनमें सबसे अधिक कही जानेवाली कथा इस प्रकार हैः कश्यप बुद्ध की मृत्यु के बाद उनके अवशेषों को एक वृद्ध महिला और उसके चार पुत्रों ने इसी स्तूप के स्थान पर दफना दिया था। इसके बाद उन्होंने इस स्थान पर एक मन्दिर बनाने की अनुमति राजा से माँगी। राजा ने अनुमति दे दी। कड़ी मेहनत और तमाम त्यागों के बाद इस स्तूप की नींव बनकर तैयार हुई। इसके विशाल आकार और भव्य संरचना के कारण यहाँ रहनेवाले आसपास के लोगों को बहुत ईर्ष्या हुई। वे सभी राजा को उस वृद्ध महिला के विरुद्ध उकसाने के लिए राजा के महल में पहुँचे। वे राजा से स्तूप निर्माण का काम रुकवाने के लिए प्रार्थना करने लगे। उन्होंने राजा से कहा कि अगर एक गरीब औरत इतना बड़ा स्तूप बनवा सकती है तो राजा को तो पहाड़ से भी ऊँचा स्तूप बनवाना चाहिए। परन्तु राजा ने उन लोगों को मना कर दिया। राजा का कहना था कि उसने उस महिला को स्तूप के निर्माण की अनुमति एक बार दे दी है तो अब वह निर्माण कार्य नहीं रूकवा सकता। और इस प्रकार इस स्तूप का निर्माण 7 वर्षों में जाकर पूरा हुआ।
सच क्या है? यह तो नहीं पता पर इस स्तूप की बुनियाद पर कई पुनर्निर्माण हुए हैं और मुस्लिम आक्रमण के बाद हुए पुनरूद्धार के समय, जो स्वरूप तैयार हुआ था यह स्तूप आज भी उसी रूप में है। तिब्बत में वर्ष 1959 में हुए चीनी-तिब्बत विद्रोह के बाद नेपाल में आए तिब्बती शरणार्थियों ने इसे आज काठमाण्डू का महत्वपूर्ण पर्यटन केन्द्र बना दिया है।
स्तूप के ऊपर चार आँखें बनाई गई हैं जो काठमाण्डू शहर की चारों दिशाओं पर नजर रखती हैं। स्तूप के चारों ओर करीब 29 गोम्पा भी हैं। बताया गया कि ये सभी गोम्पा (तिब्बती मठ) तिब्बती शरणार्थियों द्वारा पिछले 4-5 दशकों में बनाए गए हैं। स्तूप के चारों ओर सुव्यवस्थित और सुसज्जित दुकाने हैं, रेस्तरां हैं और कुछ रेस्टहाउस भी हैं। एक ओर हमें अजीमा का मन्दिर भी मिला जो छोटी माता (स्मॉल पॉक्स) को समर्पित है। हम वहाँ बने जामचेन गोम्पा में गए, जहाँ एक बहुत बड़ा प्रार्थनाचक्र बना हुआ था। इस गोम्पा में मैत्रेय बुद्ध की एक बड़ी मूर्ति स्थापित थी। कुछ श्रद्धालु मक्के के आंटे से एक धर्मचिन्ह बना रहे थे।
स्तूप के एक दरवाजे से हम ऊपर भी चढ़े। सैकड़ों कबूतरों से पूरा स्तूप भरा हुआ था। बहुत सारे बौद्ध श्रद्धालु एक अनुष्ठान कर रहे थे, वैसे ही जैसे हिन्दुओं में कर्मकाण्डों की परम्परा है। घी के दिए जलाए गए थे, चारों ओर चन्दन की खुशबू फैली हुई थी। स्तूप के शिखर से नीचे तक झण्डियाँ लगाई गई थीं। इन रंगबिरंगी झण्डियों पर तिब्बती भाषा में श्लोक लिखे हुए थे। स्तूपों पर गेहूँ चढ़ाया जाता है और पानी गिरने के बाद दानों के फूलने एवं पैरों से दब जाने के कारण फिसलन भी होती है। ऐसे में स्तूप के ऊपर चढ़ना मुश्किल था। गेहूँ के दाने शायद कबूतरों के लिए थे। नीचे उतरकर हमने भी स्तूप की एक परिक्रमा की। स्तूप के आधार (बेस) पर ध्यानीबुद्ध अमिताभ के 108 अभिलेख हैं और ईंट की गोलाकार दीवार पर 147 ताखे (नीचेज) बनाए गए हैं। प्रत्येक ताखे में 4 या 5 छोटे प्रार्थनाचक्र हैं जिनपर ओम मणि पद्मे हूम का मन्त्र अंकित है। समस्त श्रद्धालु परिक्रमा के समय इन प्रार्थनाचक्रों को घुमाते रहते हैं।
उस बौद्ध भिक्षु ने बताया था कि बौद्धनाथ के चारों ओर जो 29 गोम्पा हैं वे तिब्बती बौद्ध धर्म के चारों पन्थ- यथा निंगमाप, गेलुक्प, शाक्यप और कांग्यूक्प-का प्रतिनिधित्व करते हैं। नेपाल में रहनेवाले तिब्बती बौद्धों में से 90 प्रतिशत निंगमाप के अनुयायी हैं जिनमें अधिकांश शेरपा और तमांग जाति के लोग हैं। इसी निंगमाप पन्थ के संस्थापक, पद्मसम्भव, ने तिब्बत के राजा के निमंत्रण पर वहाँ जाकर तिब्बत में प्रचलित बोन धर्म को समाप्त कर, बौद्ध धर्म की स्थापना की थी। दूसरे गेलुक्प पन्थ के संस्थापक महान् भारतीय विद्वान अतिश थे जो बिहार के विक्रमशिला विश्वविद्यालय से तिब्बत गए थे। दलाई लामा और पांछेन लामा, इसी पन्थ से ताल्लुक रखते हैं। शेष दोनों पन्थों के मठ बौद्धनाथ के अतिरिक्त नेपाल में अन्य स्थानों पर भी हैं। कुल मिलाकर इन चारों पन्थों पर बौद्ध धर्म के वज्रयान सम्प्रदाय का प्रभाव अधिक दिखा जिसमें तान्त्रिक क्रियाओं और कर्मकाण्डों का भरपूर समावेश है। हिन्दू मन्दिरों के विपरीत, इस स्तूप के दरवाजे समस्त अहिन्दुओं के लिए भी खुले हुए हैं। हमें इस धर्मस्थल पर नेपाली प्रभाव के मुकाबले तिब्बती प्रभाव अधिक नजर आया। श्रद्धालुओं की वेशभूषा, बोली, दुकानों पर बेची जानेवाली सामग्री और आराधना के तौर-तरीके से यह स्पष्ट हो जाता है। दो घण्टे का समय व्यतीत करने के बाद करीब साढ़े चार बजे हम पशुपतिनाथ मन्दिर की ओर निकले।
पशुपतिनाथ
हमारे ड्राइवर रूसन ने हमें पशुपतिनाथ मन्दिर पिछले गेट से पहुँचाया। इस गेट के पास गाड़ी पार्किंग की पर्याप्त जगह थी। थोड़ी दूर चलने के बाद हम मन्दिर के मुख्यद्वार पर थे। मन्दिर में अहिन्दुओं का प्रवेश, चमड़े का सामान, वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी पूरी तरह निषिद्ध है। ऐसे सामान को सुरक्षित रखने के लिए मुख्यद्वार के पास निःशुल्क लॉकर सेवा उपलब्ध है। इन औपचारिकताओं के बाद हम इस महान् मन्दिर में प्रवेश कर पाए। एकदम साफ सुथरा और सुव्यवस्थित प्रांगण था। मुख्य मन्दिर के पास जलाए गए दियों की लौ चमक रही थी। भारत स्थित मन्दिरों से प्रायः एकदम अलग यहाँ फूलपत्ती और अन्य पूजा सामग्री चढ़ाने की प्रथा नहीं है। ये सारी सामग्रियाँ मन्दिर के बाहर दुकानों पर बिकती अवश्य है, श्रद्धालु इन्हें मन्दिर में लाते भी हैं परन्तु इन्हें प्रतिमा के समक्ष समर्पित न करते हुए स्पर्श मात्र करा वापस लौटा दिया जाता है।
मन्दिर प्रांगण में प्रवेश करते ही एक अजीब सी अनुभूति और एक आह्लाद से जैसे अन्तर्मन प्रफुल्लित होने लगा था। ऐसी खुशी क्यों मिली, इसका वास्तविक कारण तो नहीं पता, पर लगा जैसे हमारी नेपाल यात्रा का वास्तविक उद्देश्य ही यही था। करीब ढाई घण्टे इस प्रांगण में रहे। प्रत्येक छोटे बड़े मन्दिर मूर्तियों का दर्शन, मनोभावों का समर्पण, अन्तर्तम तक उद्वेलित श्रद्धा का अर्पण किया। हालांकि मैं महान् आस्तिक नहीं हूँ किन्तु यहाँ आकर अपनी सीमाओं से भली-भाँति अवगत हो गया।
कहते हैं, निष्ठा से माँगी गई हर मन्नत यहाँ पूरी होती है। पशुपतिनाथ मन्दिर नेपाल में हिन्दुओं का पवित्रतम तीर्थस्थल है। किसी भी हिन्दू की एक इच्छा इस मन्दिर दर्शन की अवश्य होती है। नेपाल के अन्य मन्दिरों के विपरीत, जहाँ शिव के विनाशक प्रतीक कालभैरव की पूजा होती है, इस मन्दिर में शिव के पशुपतिनाथ रूप को पूजा जाता है। मन्दिर में स्थापित भगवान शिव नेपाल के संरक्षक देव है। राजशाही के दौरान उद्घोषित समस्त राजाज्ञाओं में पशुपति शब्द का उल्लेख अवश्य होता था। यूनेस्को द्वारा संरक्षित नेपाल के सात विश्व धरोहरों में इस मन्दिर का भी नाम है।
यह रोचक तथ्य है कि इस देवता को बौद्ध धर्म में भी बहुत पवित्र माना गया है। नेपाली संवत्सर के माघ माह (फरवरी) में एक दिन नेपाल के बौद्ध अनुयायी इस प्रतिमा को अवलोकितेश्वर के रूप में पूजते हैं। रास्ते में ड्राइवर रूसन ने बताया था कि एकादशी के दिन इस मन्दिर में अधिक भीड़ उमड़ती है। शाम को विशेष आरती, भक्ति संगीत और दीप प्रज्वलन का विशेष आयोजन होता है। महाशिवरात्रि के दिन यहाँ मेला लगता है और भारी भीड़ भी होती है। तीज और हरबोधिनी एकादशी भी इस मन्दिर के विशेष आयोजन हैं।
पशुपतिनाथ मन्दिर को लेकर बहुत सारी दन्तकथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार मन्दिर का रिश्ता नित्यानन्द नाम के एक ब्राह्मण से है। कहते हैं, नित्यानन्द की गाय रोज एक टीले पर जाकर अपना दूध बहा दिया करती थी। एक बार भगवान ने उसे सपने में दर्शन दिया। इसके बाद उस टीले की खुदाई की गई तो एक भव्य शिवलिंग प्राप्त हुआ।
एक अन्य कथा के अनुसार भगवान आशुतोष सुन्दर इस तपोभूमि से आकर्षित होकर एक बार कैलाश छोड़कर यहीं रम गए। यहाँ वे तीन सींगवाले मृग बनकर विचरण करने लगे। इसी वजह से इस इलाके को पशुक्षेत्र या मृगस्थली भी कहते हैं। शिव को गायब देखकर ब्रह्मा और विष्णु को बहुत चिन्ता हुई। खोज करने पर इस इलाके में उनका ध्यान तीन सींगवाले मृग पर गया। ब्रह्मा ने पहचानकर मृग का सींग पकड़ने की कोशिश की तो भगवान शिव ने नदी के दूसरे किनारे पर छलाँग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकड़ों में टूटकर बिखर गया। तभी भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए।
पशुपतिनाथ के विषय में एक कथा और है। महाभारत युद्ध में पाण्डवों द्वारा अपने गुरूओं और सगे सम्बन्धियों का वध किए जाने से भगवान भोलेनाथ, पाण्डवों से नाराज़ थे। भगवान श्रीकृष्ण और महर्षि वेदव्यास की सलाह पर पाण्डव, भगवान शिव को मनाने चल पड़े। गुप्तकाशी में पाण्डवों को देखकर, भगवान शिव वहाँ से विलीन हो गए और उस स्थान पर पहुँच गए, जहाँ आज केदारनाथ धाम है।
भगवान शिव का पीछा करते हुए पाण्डव केदारनाथ तक पहुँचे। इस स्थान पर पाण्डवों को आया देखकर शिव ने एक भैंसे का रूप धारण कर लिया और इस क्षेत्र में चर रहे भैंसों के झुण्ड में शामिल हो गए। पाण्डवों में से भीम दो पहाड़ों के बीच अपनी दोनों टांगें फैलाकर खड़े हो गए। समस्त भैंसें भीम के पैरों के नीचे से होते हुए निकल गईं परन्तु एक भैंसे ने पैरों के नीचे से जाना स्वीकार नहीं किया। ऐसे में पाण्डवों ने भगवान शिव को पहचान लिया। तब भगवान शिव भैंसे के रूप में ही भूमि में समाने लगे। भीम ने भैंसे को पीछे से कसकर पकड़ लिया और सभी पाण्डव आर्त स्वर में भगवान की स्तुति करने लगे। विवश होकर भगवान प्रकट हुए और पाण्डवों को पापों से मुक्त कर दिया। परन्तु इसी बीच उस भैंसे का सिर काठमाण्डू स्थित मन्दिर की भूमि पर निकल आया था। और इसी स्थान पर आज पशुपतिनाथ मन्दिर स्थापित है।
माना जाता है कि पशुपतिनाथ का द्वादश ज्योर्तिलिंगों में अस्तित्व नहीं है परन्तु केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योर्तिलिंग कहा गया है। भैंसे के सिर की तो पशुपतिनाथ में, भैंसे की पीठ के रूप में केदारनाथ में शिवलिंग की पूजा होती है। कहते हैं, यहाँ दर्शन करनेवाले भक्तों का मृत्यु के पश्चात् कभी पशु योनी में जन्म नहीं होता है। मन्दिर के पुजारी तरह-तरह की दन्तकथाएँ बड़ी श्रद्धा से सुना रहे थे। मुख्य मन्दिर में मूर्तिदर्शन के उपरान्त हमने पूर्वोत्तर भाग में स्थित वासुकी मन्दिर का दर्शन किया। कालभैरव सहित हजार शिवलिंगवाले क्षेत्र का दर्शन किया। मन्दिर प्रांगण में राजा महेन्द्र तथा वीरेन्द्र की प्रतिमाएँ भी हैं। कुल मिलाकर इस प्रकार के कुल 27 दर्शनीय स्थल मन्दिर प्रांगण में हैं।
मन्दिर की पूर्व दिशा में प्रवाहित बागमती नदी नेपाल की सबसे पवित्र नदी है। दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब यहाँ पर नदी नहीं, एक गन्दा नाला बहता है। नेपाल सरकार तथा पशुपति विकास ट्रस्ट को बहुत कुछ करने की आवश्यकता है ताकि नदी के साथ-साथ मन्दिर की पवित्रता भी अक्षुण्ण रखी जा सके। इस नदी के किनारे शवों का दाह संस्कार भी होता है। पिछले दोनों अवसरों की तरह इस बार भी जल रही एक चिता नज़र आई। शाही परिवार के लिए अलग स्थान नियत है। जून 2001 में नारायणहिति राजमहल में हुए हत्याकाण्ड के बाद राजा वीरेन्द्र, महारानी ऐश्वर्या और परिवार के अन्य सदस्यों का अन्तिम संस्कार यहीं हुआ था। मन्दिर से बाहर निकलते समय एक अन्य अर्थी को यहाँ लाते हम सबने देखा।
प्रतिमा दर्शन के बाद हम काफी देर तक मन्दिर के सामने चबूतरे पर बैठे रहे। मन नहीं माना एक बार फिर दर्शन के लिए कतार में लग गए। अब तक अन्धेरा घिरने लगा था और दीपों से निकला प्रकाश और स्पष्ट होने लगा। दोबारा दर्शन के दौरान प्रतिमा को ध्यान से देखा। प्रतिमा काले पत्थर की होकर चतुर्मुखी है जो चारों दिशाओं में बने गर्भगृह के चार द्वारों से एक जैसी देखी जा सकती है। चारों मुखों के एक हाथ में रूद्राक्ष तथा दूसरे हाथ में कमण्डल है।
यह प्रतिमा (शिवलिंग) करीब 6 सौ वर्ष पुरानी है जबकि इस मन्दिर का इतिहास दो हजार वर्ष पुराना है। चार मुखों के नाम अलग-अलग हैं- पूर्व की ओर तत्पुरूषा, दक्षिण की ओर अघोरा, उत्तर की ओर कामदेव और पश्चिम की ओर बने मुख को साध्योजटा के नाम से जाना जाता है। लिंग के ऊपर का भाग ईशान कहलाता है। पशुपतिनाथ के इस शिवलिंग के चार मुखों को चार धर्मों और हिन्दू धर्म के चार वेदों का प्रतीक माना गया है।
वर्ष 1346 में बंगाल के सुल्तान शम्शुद्दीन ने इस मन्दिर पर आक्रमण किया था और मुख्य प्रतिमा को तीन टुकडों में तोड़ दिया था। वर्तमान मन्दिर आज जिस स्वरूप में हमारे समक्ष है उसका निर्माण वर्ष 1696 में कराया गया था। वर्तमान शिवलिंग की चमक कुछ खास धातुओं से बनी होने की वजह से बेमिसाल है। नेपालवासी तो यहाँ तक मानते हैं कि इस शिवलिंग में पारस पत्थर के गुण हैं। इस मन्दिर के चारों दरवाजे़ चाँदी के हैं। मन्दिर में देवता के समक्ष किसी भी प्रकार की पशुबलि नहीं चढ़ाई जाती। बलि चढ़ाने के लिए मन्दिर के बाहरी प्रांगण में गुह्येश्वरी मन्दिर है।
मन्दिर के पुजारी मूलभट्ट कहलाते हैं जो दक्षिण भारत के राज्य कर्णाटक से आते हैं। ऐसी परम्परा आदिगुरु शंकराचार्य के प्रयासों से प्रारम्भ हुई जब उन्होंने सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से अखण्ड भारत का स्वप्न देखा था। युगों पुरानी परम्परा और प्रथा के अनुसार पशुपतिनाथ मन्दिर में वर्तमान में दो भारतीय पुजारी- गिरीश भट्ट और राघवेन्द्र भट्ट- नियुक्त हैं।
मुख्य मन्दिर पैगोडा शैली में बना हुआ है। मन्दिर के समक्ष नन्दी की दो प्रतिमाएँ विराजमान हैं। बड़ी प्रतिमा पीतल की है जो 100 वर्ष पुरानी है जबकि छोटी करीब 300 वर्ष। गैरहिन्दुओं के लिए मन्दिर में प्रवेश वर्जित है किन्तु वे मन्दिर को बागमती नदी की दूसरी तरफ से देख सकते हैं।
गुह्येश्वरी मन्दिर बाहरी प्रांगण में है। इसे नेपाल में शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। कहते हैं, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर दुःख और गुस्से में समूचे विश्व में घूम रहे थे, उसी दौरान मृत सती के शरीर का एक अंग यहाँ भी गिरा था और इसी स्थान पर गुह्येश्वरी शक्तिपीठ निर्मित है। समूचे मन्दिर प्रांगण में सैकड़ों बन्दर हैं और प्रत्येक श्रद्धालु को उनसे सतर्क रहना पड़ता है।
अन्धेरा होते-होते हम होटल वापस आ चुके थे। थोड़ी देर तक हाथ पैर सीधा किया और एक घण्टे के बाद ठमेल के लिए निकल गए। वास्तव में मेरा मानना है कि जब तक किसी शहर को पैदल न देखो तब तक वह आपकी जे़हन में उतरता नहीं है। इसी कारण टूर ऑपरेटर से पैकेज में डिनर नहीं डालने का अनुरोध किया था। डिनर के ही बहाने हम बाहर निकल सकते थे। ठमेल के बारे में मैंने पहले से ही सुन रखा था। होटल के मैनेजर ने बताया कि यहाँ से पैदल पाँच मिनट का रास्ता है।
सड़क पर चलने के थोड़ी देर बाद ही नारायणहिति महल दिखा, फिर उसके बाद स्पप्न बगइचा। उसके सामने अमेरिकी दूतावास है। वास्तव में हमारा होटल रामा इन. काठमाण्डू के दरबार एरिया में था। इसी क्षेत्र में ब्रिटेन, भारत, फ्रांस, फिनलैण्ड, पाकिस्तान और मोरक्को के दूतावास भी हैं। सार्क संगठन का सचिवालय भी दिखा। इन इमारतों के सामने से गुजरते हुए हम ठमेल आ पहुँचे थे।
वर्ष 1950 तक नेपाल शेष विश्व से पूरी तरह कटा हुआ अलग-थलग देश था। इसी समय तिब्बत पर चीनी आक्रमण के बाद भारत अपने हितों को लेकर सतर्क हुआ। तत्समय राणा नेता मोहन शमशेर जंगबहादुर राजा त्रिभुवन को हटाकर उसके अवयस्क पोते को राजगद्दी पर बिठाना चाह रहा था। तब राजनयिक प्रयासों के बाद नेपाल में प्रभावशाली राणाओं के अल्पतन्त्र के स्थान पर राजा त्रिभुवन को मदद देकर भारतसमर्थित सत्ता को स्थापित किया गया। इस प्रकार नेपाल में वर्ष 1843 से आरम्भ राणाओं के प्रभुत्व का अन्त वर्ष 1951 में जाकर हुआ।
भारत ने इसी क्रम में भारतीय सीमाओं को काठमाण्डू से जोड़नेवाले त्रिभुवन राजपथ का निर्माण कराया। सन् 1956 में यह नगर वायुमार्ग से जुड़ गया। कहते हैं, पर्यटन के नाम पर वर्ष 1955 में काठमाण्डू में मात्र एक रेस्तरां था। और आज पर्यटन को, नेपाल का हिन्दू और बौद्ध धर्म के बाद, तीसरा धर्म कहा जाता है। पर्यटन नेपाल की अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्योग है।
जब काठमाण्डू में पर्यटन उद्योग ने जन्म लिया तो पहला होटल, काठमाण्डू गेस्ट हाउस, इसी ठमेल क्षेत्र में खुला और आज यह ठमेल, इस शहर में आनेवाले पर्यटकों का सर्वाधिक पसन्दीदा क्षेत्र है। यह बाज़ार आधुनिक व प्राचीनकाल का मिश्रण है। रेस्तराओं और होटलों में आधुनिक समय के डिस्को, पब से लेकर प्राचीनकाल में प्रचलित गज़ल और मुजरा, सब कुछ यहाँ है। यह होटलों, रेस्तराओं, नाचघरों, बुकस्टोरों, बैंकों, गहनों, कपड़ों, मसालों, चाय समेत समस्त प्रकार की दुकानों से भरा पड़ा है।
यहाँ पशमीना शॉल मिलता है, तो ट्रेकिंग के सामान भी मिलेंगे। याक का दूध मिलता है तो शानदार कैफे भी हैं। राफ्टिंग से लेकर एयर टिकट की एजेन्सियाँ भी हैं। कम आयवाले पर्यटकों से लेकर अमीरों तक के लिए यह बाजार उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 28 सितम्बर 2011 को ठमेल को पूरी तरह वाईफाई ज़ोन बना दिया गया। नेपाल का पहला वाईफाई एरिया। काफी देर तक घूमते रहे। कुछ खरीदारी भी की।
यह क्षेत्र पर्यटकों की दुनिया में सुर्खियाँ बटोरने में सफल तब हुआ जब 70 के दशक में हिप्पियों ने इसे अपना ठिकाना बनाया। उस समय नेपाल में गांजे की खेती होती थी और उससे चरस बनाना भी कानून के मुताबिक सही था। वर्ष 1976 में अन्तराष्ट्रीय दबाव के कारण इसके उत्पादन पर रोक के साथ ही यहाँ हिप्पियों का आना भी बन्द हो गया। वैसे हिप्पियों के यहाँ न आने के कई कारण और भी हैं। मशहूर अभिनेता-निर्देशक देवानन्द ने इसी विषयवस्तु पर अपनी प्रसिद्ध फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा की शूटिंग नेपाल में ही की थी।
हर दस दुकानों के बाद एक नाचघर था। नेपाल कसीनो के लिए जाना जाता है परन्तु आजकल कसीनो बन्द हैं। बताया जाता है कि काठमाण्डू में सात तो पोखरा में भी एक कसीनो था। इस कारण सर्वाधिक भीड़ नाचघरों, पबों और डिस्कोघरों में दिखी। काठमाण्डू देर रात तक जागता है। भूख लग आई थी परन्तु कोई शाकाहारी रेस्तरां मिल नहीं रहा था। थर्डआई रेस्तरां का नाम सुना था जहाँ भारतीय भोजन मिलता है। ढूढते हुए वहाँ पर पहुँचे भी मगर वहाँ सिगरेट का धुआँ इतना था कि हम वहाँ बैठ नहीं पाए।
नेपाल में शराब पर नियंत्रण की कोई नीति नहीं है। प्रत्येक दुकान पर शराब, बीयर मिलते हैं। शुद्ध शाकाहारी रेस्तरां तो ढूंढे से नहीं मिला। सोचा, चलो होटल में ही डिनर ले लेंगे। हम वापस होटल पहुँचे परन्तु होटल मैनेजर ने बताया कि साढे़ नौ बज चुके हैं, रेस्तरां बन्द हो चुका है। नेपाल में घड़ी की सुई पन्द्रह मिनट आगे चलती है। पूछने पर बताया कि आप के.एफ.सी. या पिज्जा हट जा सकते हैं। वे दोनों साढ़े दस बजे तक खुले रहते हैं। भूख तेज लग चुकी थी।
टैक्सीवाले को सौ रुपए देकर वहाँ पहुँचे। उसी के.एफ.सी. में खाया जिसके भोपाल ब्रान्च में गन्ध के कारण खाना नहीं चाहते। खैर, खाना अच्छा लगा। भारत और काठमाण्डू के के.एफ.सी. के खाने के स्वाद में कोई अन्तर नहीं मिला। अन्तराष्ट्रीय फूड चेन के.एफ.सी. और पिज्जा हट तो मिला किन्तु मालूम पड़ा कि पूरे नेपाल में मैक्डोनाल्ड की कोई ब्रान्च नहीं है। खाने के बाद हम पैदल आइसक्रीम खाते हुए रात्रि 11 बजे वापस होटल लौटे। पूरे रास्ते नेपाल पुलिस के जवान चौकसी करते दिखे। यहाँ सड़कों पर हमें पुलिस हर स्थान पर दिखी। इस देश में अपराध कम हैं। काठमाण्डू की कानून व्यवस्था मेट्रोपोलिटन पुलिस के हाथ में हैं जिसका प्रमुख पुलिस कमिश्नर है। यहाँ पुलिस को प्रहरी बोलते हैं।
नेपाल यात्रा का आज पहला दिन था।
दूसरा दिन: सगरमाथा से स्वप्न बगइचा
हम सुबह पाँच बजे सोकर उठे। सुबह साढ़े छः बजे तक हमें त्रिभुवन हवाई अड्डे के डोमेस्टिक टर्मिनल पर रिपोर्ट करना थी। हमारा आज का पहला कार्यक्रम एवरेस्ट माउण्टेन फ्लाइट था। सिमरिक एयरलाइन्स का टिकट हमारे पास था। वे पर्यटक, जो टेकिंग नहीं करना चाहते, उनके लिए काठमाण्डू से नेपाल की समस्त ऊँची चोटियों (माउण्ट एवरेस्ट सहित) को एक घण्टे की फ्लाइट से देखना सर्वोत्तम विकल्प है। इस फ्लाइट के टेक ऑफ करने के तत्काल बाद ही हम उन समस्त चोटियों और पर्वत श्रृंखलाओं को अपनी आखों से देखनेवाले थे जिनके बारे में हमने पढ़ा, सुना और किताबों एवं इन्टरनेट पर देखा था।
प्लेट टेक्टॉनिक सिद्धान्त के अनुसार, इण्डियन प्लेट, जिसमें भारत स्थित है, उत्तर की ओर 2.0 इंच प्रतिवर्ष की गति से बढ़ रहा है और यूरेशियन प्लेट, जिसमें नेपाल के उत्तर के देश है, से टकरा रहा है। यह गति मानव के उंगलियों में नाखून बढ़ने की गति से दोगुनी है। इस टकराव के कारण तुलनात्मक दृष्टि से कमज़ोर तिब्बती क्रस्ट इण्डियन प्लेट के नीचे जा रहा है। इस कारण हिमालय पर्वत की ऊँचाई और बढ़ती जा रही है। नेपाल का समूचा भौगोलिक क्षेत्र ही भूगर्भीय दृष्टि से अस्थिर है। कहते हैं, इस क्षेत्र में 100 वर्षों में एक बार बड़ा भूकम्प आता है। 20000 फीट से अधिक ऊँचाईवाली 240 चोटियाँ नेपाल में हैं और विश्व की 10 सबसे ऊँची चोटियों में से 8 यहीं हैं। इन्हीं आठ चोटियों यथा- ल्होत्से, मकालू, चो-यू, कन्चनजंघा, धौलागिरी, अन्नपूर्णा और मनास्लू सहित माउण्ट एवरेस्ट को देखने हम हवाई अड्डे पहुँचे थे।
हमें कुछ जानकारियों के साथ एक माउण्टेन प्रोफाईल भी दी गई जिसमें समस्त चोटियों के क्रम से नाम और ऊँचाई का विवरण था। ठीक पौने आठ बजे हमारी फ्लाइट ने टेक ऑफ किया। हवाई अड्डे पर कई अन्य एयरलाइन्स के विमान भी खड़े और उड़ रहे थे जो इस प्रकार की सेवाएँ देते हैं। इस विमान में हम कुल 18 पर्यटक थे और सभी विन्डो सीट पर बैठे थे। थोड़ी ही देर में हम बादलों से ऊपर आ गए और आसमान से होड़ करती बर्फीली चोटियाँ बाईं ओर दिखने लगीं। धौलागिरी से हमने शुरूआत की और गौरीशंकर होते हुए एक-एक कर इन चोटियों को देखते हुए एवरेस्ट के 20 कि.मी. की दूरी तक आ गए। स्तब्ध कर देनेवाले दृश्य थे। हम सब जैसे जड़वत थे, सिर्फ आँख की पुतलियाँ ही चलायमान थीं। बहुत ही रोमान्चक और जीवन भर न भूलनेवाली दृश्यावली हमारे समक्ष थी। बीच-बीच में एयर होस्टेस हम सभी को उन चोटियों के बारे में बताती रही। सभी पर्यटक बारी-बारी से कॉकपिट में जाकर भी इन चोटियों को देख सकते थे। हमने भी देखा। खिड़कियों के मुकाबले कॉकपिट से देखना अधिक रोमान्चक था। एक घण्टे की उड़ान कैसे बीत गई, पता नहीं चला।
उत्तराखण्ड त्रासदी के दौरान मैंने हेलिकॉप्टर से हिमालयी क्षेत्रों के ऊपर से कई बार उड़ान भरी है, मगर इस एक घण्टे की पर्वतीय उड़ान, श्वेत हिमालयी चोटियों के नज़ारे और बिना चढ़ाई किए नज़दीक से 8000 मीटर से अधिक की ऊँचाईवाले अन्य पर्वतों के आसमानी दृश्य देखना अद्भुत आनन्द है। विश्व के सबसे ऊँचे पर्वत को शान्त आकाश से देखने की माउण्टेन फ्लाइट के इस अनुभव की तुलना किसी से नहीं की जा सकती। पायलट ने कन्चनजंघा को दिखाने के बाद विमान को वापसी की ओर मोड़ लिया। अब ये सारी चोटियॉं हमारी दाईं ओर से दिखने लगी थीं। बादल बहुत नीचे थे और विमान इन चोटियों की ऊँचाई के बराबर में उड़ रहा था। वापसी पर समस्त पर्यटकों को एक प्रमाण-पत्र दिया गया, जैसे एवरेस्ट ने हमें बधाई प्रेषित की हो। नेपाली भाषा में माउण्ट एवरेस्ट को सगरमाथा के नाम से जानते हैं।
विमान से उतरने के बाद बस से टर्मिनल तक आने के दौरान नेपाल वायुसेना का एयर-बेस दिखा। उसी बेस पर नेपाल का राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहा था। पूरी दुनिया में नेपाल ही एक ऐसा देश है जिसका झण्डा आयताकार नहीं है। झण्डे में अर्द्धचन्द्र के साथ-साथ, एक सूर्य भी है। यह जानकर एक असीम शान्ति मिली और हैरानी भी हुई कि नेपाल का राष्ट्रीय वाक्य (मोट्टो) जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी (माँ और मातृभूमि, दोनों स्वर्ग से बेहतर हैं) है, उसी प्रकार जैसे भारत का “सत्यमेव जयते” है।
फ्लाइट के दौरान मिले अनुभवों को साझा करते हुए हम वापस होटल लौटे। सुबह के नाश्ते के बाद हम पाटन, भक्तपुर और नगरकोट के लिए निकल गए।
भक्तपुर
ड्राइवर जिम ने हमें सुबह दस बजे भक्तपुर पहुँचा दिया था। यहाँ पहुँचकर हमने टिकट लिए और एक गाइड भी। गाइड कृष्णा ने बताया कि काठमाण्डू घाटी के तीनों नगरों यथा- काठमाण्डू, पाटन और भक्तपुर, में यह नगर सर्वाधिक परम्परावादी है। आधुनिकता का प्रभाव इस नगर में न्यूनतम हुआ है। यहाँ पर रहनेवाले लोग नेवार जाति के हैं और अधिकांश खेती से जुड़े हैं। यही नेवार जाति के लोग नेपाल के मूल निवासी हैं, शेष जातियाँ बाहर से आईं आप्रवासी हैं। यहाँ नेपाल भाषा बोली जाती है जो विशेषकर नेवारी जाति के लोगों की भाषा है जबकि घाटी के अन्य नगरों की भाषा नेपाली है। यहाँ की औरतें लाल और काले रंग की परम्परागत साडि़यों में दिखीं।
जहाँ काठमाण्डू और पाटन में हिन्दू और बौद्धों की मिश्रित आबादी रहती है, वहीं इस भक्तपुर में सिर्फ हिन्दू धर्मावलम्बी हैं। 9वीं सदी में बसा यह नगर काठमाण्डू के पहले नेपाल की राजधानी हुआ करता था। पर्यटन की दृष्टि से भक्तपुर नेपाल का सर्वाधिक संरक्षित क्षेत्र है। वर्ष 1974 में ऑस्ट्रिया की मदद से भक्तपुर डेवलेपमेन्ट प्रोजेक्ट ने इस नगर को सुव्यवस्थित रूप से संवार दिया है।
गाइड कृष्णा ने दरबार स्क्वायर से शुरूआत की। काठमाण्डू के तीनों नगरों- भक्तपुर, काठमाण्डू और पाटन में दरबार स्क्वायर हैं। ये तीनों यूनेस्को के विश्व धरोहर सूची में शामिल भी हैं। कीर्तिपुर नगर में भी एक दरबार स्क्वायर है परन्तु विश्व धरोहर सूची में शामिल नहीं है।
दरबार स्क्वायर में घुसते ही सिंह की दो मूर्तियाँ मिलीं। वहीं उग्रचण्डी और भैरव की दो प्रभावशाली प्रतिमाएँ सुशोभित हैं। इसके दाईं ओर, भारत में पवित्रतम माने जानेवाले चारों धाम यथा- बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम् और जगन्नाथपुरी की प्रतिकृतियाँ बनी हुई हैं। मन्दिर निर्माण की तीनों शैलियों-शिखर, पैगोडा और स्तूप- का उपयोग इन प्रतिकृतियों में किया गया है। जहाँ बद्रीनाथ और द्वारिका के मन्दिर पैगोडा शैली में हैं, वहीं जगन्नाथपुरी का मन्दिर शिखर शैली में है, जबकि रामेश्वरम् के मन्दिर में दोनों पैगोडा और स्तूप शैलियों का उपयोग किया गया है। ये मन्दिर उन श्रद्धालुओं के लिए बनाए गए थे जो भारत जाकर चारधाम की यात्रा पूरी करने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं थे।
वहीं 9 मन्जिला राजमहल था जो वर्ष 1934 के भूकम्प में ध्वस्त हो गया था। एक भाग में अभी वहाँ श्रीपद्म स्कूल सन्चालित हो रहा है। इसके अतिरिक्त, वहाँ वत्सल दुर्गा मन्दिर भी है। बाद में कृष्णा ने हमें महल के सामने राजा भूपतिन्द्रनाथ की एक कांसे की मूर्ति दिखाई जो एक ही पत्थर से बने स्तम्भ पर हाथ जोडे़ बैठी है। उसके सामने गोल्डन टेम्पल है। मन्दिर तलेजू माता (माँ दुर्गा) का था जहाँ दशहरा (दशैन) के समय सत्रह दिन यहाँ की कुमारी निवास करती हैं। इस दौरान वे पूजी जाती हैं। चलते-चलते नेपाल में कुमारी प्रथा के बारे में भी थोड़ी बहुत चर्चा सुनी, रोचक लगा।
नेपाल में कुमारी पूजा एक संस्था के रूप में स्थापित है। जहाँ भारत में मात्र एक दिन, दशहरे के समय कुमारी पूजा होती है, वहीं नेपाल में कुमारी को तब तक पूजने की प्रथा प्रचलित है जब तक कि वह युवती न बन जाए। इस दौरान वह जीवित देवी के रूप में पूजी जाती है। मान्यता के अनुसार, जब तक युवती नहीं हो जाती तब तक उसके शरीर में स्वयं माँ दुर्गा वास करती हैं। नेपाल में इस कुमारी का चयन चार अथवा पाँच वर्ष की आयु में नेवारी समुदाय के शाक्य अथवा वज्राचार्य कुल की लड़कियों में से किया जाता है जिसके परिवारवाले सोने अथवा चाँदी का व्यवसाय करते हैं। इस प्रकार की कुमारियों की पूजा नेपाली हिन्दुओं के साथ-साथ नेपाली बौद्धों में भी प्रचलित है। ऐसी कुमारियाँ नेपाल के विभिन्न शहरों में हैं। शाहीकुमारी काठमाण्डू नगर में दरबार स्क्वायर क्षेत्र में रहती है। इसका स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वर्तमान में शाहीकुमारी का नाम मतिना शाक्य है। इस कुमारी का चयन उस माओवादी सरकार ने अक्टूबर 2008 में किया जिसने राजशाही का अन्त किया था। दूसरा स्थान पाटन स्थित कुमारी समिता वज्राचार्य का आता है।
मान्यता के अनुसार जिस दिन कुमारी को मासिक धर्म प्रारम्भ हो जाता है, तलेजू माता (दुर्गा माता का नेपाली रूप) उसका शरीर छोड़ देती हैं और परम्परा अनुसार नई कुमारी का चयन होता है। गम्भीर बीमारी अथवा चोट लगने के दौरान, अधिक खून निकल जाने के कारण भी नई कुमारी का चयन आवश्यक हो जाता है।
शाक्य शास्त्रों के अनुसार देवी महात्यम अथवा चण्डी देवी को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि वह विश्व की समस्त स्त्रियों में निवास करती हैं। कुमारी पूजा के समस्त रीति-रिवाज और पूजा पद्धति का महत्व इन्हीं शब्दों पर आधारित है। परन्तु देवी की पूजा-अर्चना में व्यस्क स्त्री पर कुमारी को वरीयता देना इसलिए आवश्यक समझा गया क्योंकि कुमारी की शुद्धता और पवित्रता अधिक है। और यही माँ दुर्गा की मुख्य चारित्रिक विशेषता है।
हिन्दू तान्त्रिक शास्त्रों के अनुसार एक वर्ष की कुमारी को संध्या, चारवर्षीया बालिका को कालिका, पाँचवर्षीया को सुमंग और इसी प्रकार सोलहवर्षीया बालिका को अम्बिका कहा गया है। कुल मिलाकर कुमारी पूजा का मूल उद्देश्य मानव मात्र से प्रेम करना, विशेष रूप से महिलाओं के दैवत्य को स्थापित करना है। नेपाल में कुमारियों की इस प्रकार की पूजा, दो-तीन सदी पूर्व की घटना है परन्तु 13वीं सदी के लेखी साक्ष्य बताते हैं कि उस समय भी कुमारियों का चयन और पूजा अर्चना होती थी।
इसकी शुरूआत की बहुत सारी दन्तकथाएँ हैं। परन्तु सर्वाधिक लोकप्रिय कथा मल्ल राजा जयप्रकाश से जुड़ी है। कथा के अनुसार, एक लाल रंग का नाग राजा की सभा में देर रात्रि के समय पहुँचा और उसने एकान्त में राजा के समक्ष एक प्रस्ताव रखा कि देवी तलेजू, उनके साथ त्रिपासा (एक पांसे का खेल) खेलना चाहती हैं। राजा तैयार हो गए। उस रात तलेजू माता और राजा दोनों को खेल में बहुत आनन्द आया। इसके बाद तो देवी राजा के पास रोज़ त्रिपासा खेलने आने लगीं। लेकिन तलेजू माता ने राजा के समक्ष एक शर्त रखी थी कि वह देवी के बारे में किसी को कुछ नहीं बताएगा। एक रात रानी को शक हुआ कि राजा रोज़ रात्रि में आाखि़र जाते कहाँ हैं। वह राजा के पीछे-पीछे आईं और देवी को देख लिया।
इस पर देवी क्रोधित हो गईं। राजा से कह गईं कि यदि वह अपने राज्य को बचाना चाहता है तो वह उसके लिए नेवारी शाक्य समुदाय के सुनार परिवार की एक ऐसी बालिका को ढूंढे़ जिसके शरीर में वह प्रवेश कर सकती हों। राजा को बहुत चिन्ता हुई और वह तत्काल खोज में निकल गया। वह तलेजू माता की इच्छानुसार एक कुमारी को ढूंढ कर लाया। देवी तलेजू पूर्ण विधि-विधान के साथ उसके शरीर में प्रवेश कर गईं और उसी समय से पूरे नेपाल में कुमारी पूजा की प्रथा प्रारम्भ हुई। प्रत्येक वर्ष नेपाल के राजा इन्द्रजात्रा त्यौहार के दिन शाहीकुमारी का आशीर्वाद लेते थे। नेपाल में राजशाही के अन्त के बाद अब नेपाल के राष्ट्रपति इस प्रकार का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
जब किसी कुमारी का पद समाप्त हो जाता है तो नई कुमारी को बहुत उत्साह और उमंग के साथ चुना जाता है उसी प्रकार से- जैसे दलाई लामा और पांछेन लामा का चयन होता है। चयन हेतु एक समिति होती है। बालिका खूबसूरत हो, कोई बीमारी अथवा चोट के निशान न हों, उसके दाँत अभी गिरे न हों, गर्दन शंख की तरह हो, शरीर बरगद के पेड़ की तरह, भौंहें गाय की तरह, जांघें हिरण की तरह, छाती शेर की तरह हो और आवाज कोयल की तरह मीठी और बत्तख की तरह साफ हो। आँखें और बाल एकदम काले हों। कम से कम 20 दाँत हों।
चयन की प्रक्रिया बहुत जटिल और कठोर होती है। इस प्रकार चुनी गई बालिकाओं को दशहरा त्यौहार के दौरान कालरात्रि (जिस दिन 108 भैंसों और बकरों की बलि चढ़ाई जाती है) में बलि दिए गए पशुओं के सिर और डरावने मुखौटे लगाकर नृत्य करते नर्तकों के बीच मोमबत्ती की रौशनी में तलेजू मन्दिर के आँगन में छोड़ दिया जाता है। जो बालिका सबसे कम डरती है उसे कुमारी के रूप में चुन लिया जाता है। चुनी हुई कुमारी का पूर्ण विधि-विधान से शुद्धिकरण किया जाता है। कुमारी के रूप में चुन लिए जाने के बाद वह कुमारी घर में ही रहती है। बड़े त्यौहारों को छोड़कर वह घर से बाहर नहीं निकलती और उसके परिवारवाले भी कभी-कभार ही मिलने आते हैं। उसके साथ खेलनेवाले बच्चे नेवारी परिवारों से ही लिए जाते हैं।
वह हमेशा लाल कपड़े पहनती है। सिर के बाल बंधे होते हैं और आँखों के ऊपर काजल से घेरा अग्निचक्षु बनाया जाता है। कुमारी का आचरण बिल्कुल देवी की तरह हो जाता है। उसके पाँव जमीन को छू नहीं सकते और वह हमेशा सोने की पालकी में चलती है। वह कभी-कभी जालीदार खिड़कियों में आकर दर्शन भी देती है। कुमारी घर के बाहर इसके लिए भीड़ इन्तजार करती रहती है। अगर जिस किसी को भी दर्शन प्राप्त हो जाए वह अपने आपको धन्य समझ सकता है। कभी-कभार डॉक्टर, बड़े अधिकारी, शासकीय नौकरशाह जब कुमारी से मिलने आते हैं तो अपने साथ भेंट के तौर पर उपहार भी लाते हैं। इस दौरान उनकी दृष्टि कुमारी के ऊपर बहुत ध्यान से लगी रहती है। वह कुमारी के हर भाव का अर्थ निकालते हैं:-
- चिल्लाना या जोरों से हँसना – गम्भीर बीमारी अथवा मृत्यु
- रोना अथवा आँख मलना – तुरन्त मृत्यु
- काँपना – जेल
- ताली बजाना – राजकीय प्रकोप
- उपहार में मिले खाद्य
पदार्थ को उठाना – पैसों का नुकसान
यदि कुमारी शान्त अथवा भावनाशून्य रहे तो अच्छा शगुन होता है और यह माना जाता है कि मिलनेवाले की इच्छा पूरी हो जाएगी। कुछ लोग कुमारी की देखभाल के लिए भी रखे जाते हैं जिन्हें कुमारिमि कहते हैं। इनका प्रमुख चिताईदार कहलाता है। वे कुमारी को आदेश नहीं दे सकते, पूजा पद्धति के सम्बन्ध में मात्र सलाह दे सकते हैं। परम्परा के अनुसार, कुमारी स्कूल नहीं जाती। परन्तु समय के साथ-साथ उनकी जीवन शैली में परिवर्तन आया है। भक्तपुर की कुमारी स्कूल जाती है जबकि काठमाण्डू दरबार स्क्वायर की कुमारी को प्राइवेट ट्यूटर पढ़ाते हैं। एक मान्यता के अनुसार, पूर्व कुमारी से जो विवाह करता है उसकी छः माह के भीतर मृत्यु हो जाती है। परन्तु धीरे-धीरे इस अन्धविश्वास से पर्दा उठ रहा है और इनके विवाह में अब कोई अड़चन नहीं रह गई है।
एक विवाद भक्तपुर की कुमारी सजनी शाक्य से जुड़ा हुआ है। कुमारी प्रथा पर एक फिल्म बनी थी, लिविंग गॉडेस, जिसका निर्माण अमेरिकन फिल्म फेस्टिवल और डिस्कवरी चैनल ने कराया था। इस फिल्म के लॉन्च पर कुमारी सजनी शाक्य सिल्वरस्प्रिन्ग मैरीलैण्ड, अमेरिका गई थी। कुमारी अमेरिका की यात्रा के कारण दूषित हो गईं, इस आरोप के साथ 3 जुलाई 2007 को सजनी शाक्य कुमारी पद से पृथक कर दी गई। परन्तु दो सप्ताह बाद ही मन्दिर प्रबन्धन ने अपना निर्णय बदल दिया और यह कहा गया कि चूँकि वे शुद्धिकरण संस्कार के लिए सहमत हो गई हैं, इस कारण उन्हें कुमारी पद से पृथक नहीं किया जाएगा।
अब भक्तपुर में हम आगे की ओर बढ़े। वहीं तलेजू माता मन्दिर के बाजू में तीन मन्जिला पचपन खिड़की महल था। उसके खिड़की, दरवाज़ों पर नक्काशी का नायाब नमूना देखने को मिला। ऊपर की मन्जिल पर पहुँचते ही लगा जैसे हम हवामहल में आ गए हों। नक्काशीदार खिड़कियों के छिद्रों में से हवा प्रवेश करते ही तीव्र हो जाती है। प्राचीन चि़त्रों का एक संग्रहालय भी था। बाहर निकलकर भैरव मन्दिर देखा। प्रांगण में आकर ग्रुप फोटो खिंचवाए। गाइड कृष्णा हमें विस्तार से बताता रहा।
दुकानों के बीच से निकलते हुए हम तउमड़ी स्क्वायर पहुँचे। यहाँ नेपाल का सबसे ऊॅँचा भव्य न्यातापोल मन्दिर है। पाँच मन्जिलोंवाला यह मन्दिर पैगोडा स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है जिसमें मल्ल राजाओं की कुलदेवी सिद्धिलक्ष्मी विराजमान हैं। मुझे याद आया कि पिछली बार इस स्थान पर हम बहुत देर रुके थे। कृष्णा ने बताया कि महान सहित अनेक फिल्मों की शूटिंग भी यहाँ हुई है। वर्ष 1702 में निर्मित इस मन्दिर का निर्माण ऐसी शैली में करवाया गया था कि वर्ष 1934 के विनाशकारी भूकम्प में भी इसे कोई क्षति नहीं पहुँची। वहीं नेपाल की अधिकांश इमारतें ध्वस्त हो गई थीं। भक्तपुर के अधिकांश मन्दिर और भवन वर्ष 1934 के भूकम्प के बाद ऑस्ट्रिया की मदद से या तो पुनर्निर्मित हुए हैं अथवा उनका जीर्णोद्धार किया गया है।
हम अब पॉटर्स स्क्वायर गए। तलाचो नामक इस स्थान पर हमने मिट्टी के बर्तन, वास बनाते हुए कुम्हारों को देखा। यह स्थान नेपाल के सेरामिक उद्योग का मुख्य केन्द्र है। यहॉ चाक पर बर्तन बनाते देखा, सुखाने के बाद उन्हें आग में पकाते हुए भी देखा। इसके बाद कृष्णा हमें थांग्खा पेन्टिंग्स कैसे बनाई जाती हैं उस गली में लेकर गया। प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल कर पौराणिक कथाओं और पात्रों को कपडों पर कैसे उकेरा जाता है? इसे बहुत ध्यान से देखा। हाँ, यह विषय मेरी बेटी ऋचा के लिए सर्वाधिक आनन्ददायी रहा। उसने ग्यारहवीं में वैकल्पिक विषय के रूप में फाइन आटर्स लिया है।
कुल मिलाकर भक्तपुर लाल ईंट के भवनों, लकडि़यों पर नक्काशी, मिट्टी के बर्तनों, दर्जनों मन्दिर, मण्डपों के लिए विख्यात है। यहाँ पर एक उत्कृष्ट प्रकार का दही जूजू धाऊ भी मिलता है। कहते हैं कि पूरे नेपाल में ऐसा स्वाद मिलना सम्भव नहीं है। ख़ैर, 200 रुपए का पारिश्रमिक देकर हमने कृष्णा से विदा ली। ड्राइवर जिम पहले नगरकोट ले जाना चाहता था परन्तु हमने पहले पाटन जाने का निर्णय लिया। नगरकोट वैसे भी सूर्यास्त के लिए मशहूर है।
पाटन
पूर्व में पाटन काठमाण्डू से अलग शहर था जिसे बागमती नदी विभाजित करती थी। अब पाटन काठमाण्डू का एक उपनगर बन चुका है। भक्तपुर की तरह यहाँ भी दरबार स्क्वायर है। प्रवेश टिकट के बाद हम परिसर में दाखि़ल हुए। मन्दिरों के नाम भले ही कुछ अलग हों, परन्तु हम इसे भक्तपुर के दरबार स्क्वायर से अलग नहीं कर पाए। यहाँ भी तलेजू मन्दिर, तलेजू घण्टा, गोल्डन टेम्पल, रॉयल पैलेस और भी बहुत कुछ वैसा ही है जैसा कि भक्तपुर में था। हजारों कबूतर तकरीबन समस्त भवनों, मन्दिरों के छतों पर। सारे मन्दिर या तो पैगोडा शैली में या फिर शिखर शैलीवाले थे।
परन्तु यहाँ के भवनों का आकार और ऊँचाई भक्तपुर से अधिक थी। कृष्ण मन्दिर का आकार और निर्माण काफी भव्य था। हरिशंकर मन्दिर, जगन्नारायण मन्दिर, भीमसेन का मन्दिर और रॉयल पैलेस काफी आकर्षक हैं। समस्त मन्दिरों व भवनों को हमने ग़ौर से देखा। रॉयल पैलेस की भव्यता अभी तक अक्षुण्ण थी। खिड़कियों, दरवाज़ों पर उकेरी गई नक्काशी क़ाबिले तारीफ थी।
पाटन का पुराना नाम ललितपुर है। इस नगर की स्थापना तीसरी सदी ई.पू. में किरात वंश के राजाओं ने की थी जिसका विस्तार बाद में लिच्छवियों ने किया। इस ललितपुर नाम के पीछे एक किम्वदन्ती है। बहुत समय पहले, काठमाण्डू घाटी में महाअकाल पड़ा हुआ था। उस समय इस क्षेत्र के सर्वाधिक लोकप्रिय पौराणिक देवता रातो मछेन्द्रीनाथ भारत के आसाम स्थित प्रसिद्ध कमरू कामाख्या मन्दिर में रहते थे। तब इस घाटी के तीन महत्वपूर्ण राज्यों पाटन, भक्तपुर और काठमाण्डू से एक-एक व्यक्ति प्रतिनिधि के तौर पर, कमरू कामाख्या मन्दिर भेजे गए। उन लोगों ने मछेन्द्रीनाथ से प्रार्थना की कि अगर वे नेपाल चलने को तैयार हो जाते हैं तो उनकी कृपा से नेपाल को महाअकाल से मुक्ति मिल सकती है। मछेन्द्रीनाथ नेपाल चलने को तैयार हो गए। घाटी के लोगों का दृढ़ विश्वास था कि उन्हीं के आने के कारण नेपाल में वर्षा हुई और अकाल समाप्त हुआ। रातो मछेन्द्रीनाथ को लाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ललित नाम के व्यक्ति ने निभाई जो इसी नगर के निवासी थे। इन्हीं के नाम पर बाद में इस नगर का नाम ललितपुर पड़ा। आज भी इस नगर में मई महीने में, एक धार्मिक त्यौहार बूंगाद्याह जात्रा निकाली जाती है, जिसके दौरान रथ पर रातो मछेन्द्रीनाथ की मूर्ति रखी होती है।
यहाँ की अधिकांश इमारतें सत्रहवीं सदी के प्रसिद्ध मल्ल नरेश सिद्धिनरसिंह मल्ल ने बनवाई हैं। यहाँ का भीमसेन मन्दिर नेवारी व्यापारियों का पवित्र मन्दिर है और यहाँ मंगलवार तथा शनिवार के दिन दर्शनार्थियों की भीड़ इकट्ठी होती है। वर्ष 1768 में जब शाह राजाओं ने काठमाण्डू घाटी को जीतकर काठमाण्डू के दरबार स्क्वायर में रहना प्रारम्भ किया तब से इस पाटन दरबार स्क्वायर के भी दिन फिरे। कहते हैं कि शाह राजाओं की पाटन के राजाओं से अच्छी मित्रता थी। वर्ष 1934 के भूकम्प में जहाँ भक्तपुर की अधिकांश इमारतें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई थीं, वहीं पाटन में इस भूकम्प का प्रभाव न के बराबर हुआ। पाटन की इमारतों, विशेषकर रॉयल पैलेस स्थित केशव नारायण चौक का जीर्णोंद्धार ऑस्ट्रियन सरकार की मदद से अस्सी के दशक में कराया गया। कहते हैं कि ऑस्ट्रिया के फादर जोहानेस ग्रुबर प्रथम यूरोपीय थे जो नेपाल आए।
दोपहर के दो बज चुके थे और हमें भूख भी लग आई थी। पाटन के रॉयल पैलेस में पाटन म्यूजियम के पास ही एक खूबसूरत रेस्तरां में हमने आम के एक पेड़ के नीचे लन्च किया। यह रेस्तरां प्राकृतिक खूबसूरती को अक्षुण्ण रखते हुए बेहतरीन ढंग से सन्चालित हो रहा है। वहीं काफी देर तक बैठे रहे। इसके बाद हमने पाटन म्यूजियम देखा। कहते हैं, यह म्यूजियम नेपाल ही नहीं, समूचे दक्षिण एशिया के सर्वोत्कृष्ट म्यूजि़यमों में से एक है। हमने पाटन के पास ही यहाँ के सबसे बडे़ बाज़ार, मंगल बाज़ार, का भी चक्कर लगाया। शाम के चार बज चुके थे और हमारा अगला पड़ाव नगरकोट था।
नगरकोट
पाटन से निकलकर हम लोग काठमाण्डू शहर के मध्य से होते हुए भक्तपुर के रास्ते नगरकोट जा रहे थे। नगर की अधिकांश सड़कों पर चौड़ीकरण का काम चल रहा था। इस कारण हवा में धूल अधिक थी। बहुत से लोग मास्क भी लगाए हुए थे। ब्राजील में चल रहे फीफा विश्वकप का असर काठमाण्डू में देखा जा सकता था। अधिकांश युवाओं ने अर्जेन्टीना टीम की जर्सी पहन रखी थी। यहाँ नेपाल में क्रिकेट खेलते बच्चे दिखे तो अवश्य परन्तु बहुत कम। अधिकांश मैदानों में तो फुटबॉल ही खेला जा रहा था।
सड़कों पर अधिकांश कारें जापानी टोयोटा मॉडल की थीं। मारुति की कारें भी थीं। जिम ने बताया कि नेपाल में डीज़ल और पेट्रोल बहुत महंगा है और इनकी भारी किल्लत साल भर बनी रहती है। गैस सिलिण्डर खुले बाजार में बिकते हैं। इसके लिए उन्हें ना तो कनेक्शन की आवश्यकता है और न ही इसकी राशनिंग होती है। खुले बाजार के कारण एक सिलिण्डर के लिए 1800-1900 नेपाली रुपए चुकाने पड़ते हैं। भारत की तरह नेपाल में गैस सिलिण्डर पर सरकारी अनुदान नहीं दिया जाता।
नेपाली भाषा की लिपि देवनागरी ही है। वाहनों के रजिस्ट्रेशन नम्बर भी देवनागरी लिपि में लिखे जाते हैं। काठमाण्डू में “बहुजातीय समावेशी दल” के बैनर दिखे जो कम्यूनिज्म से प्रभावित दल है। दीवालों और बैनरों पर बेरोज़गारी और अशिक्षा के नारे प्रमुखता से दिखे। खाने-पीने की दुकानों पर खाजे की दुकान लिखा था। लगभग सारे सिनेमा हॉल में हिन्दी फिल्म होलीडे लगी हुई थी। काठमाण्डू शहर में भी जहाँ-जहाँ खुली भूमि दिखी वहाँ भुट्टे की खेती हो रही थी।
सायं 5:30 बजे हम 32 किमी. की दूरी तय कर नगरकोट आ पहुँचे थे। पूरे रास्ते भुट्टे के खेत मिले। रास्ते में कोई कचरा नहीं। स्थान-स्थान पर टॉयलेट बने थे। वाहनों के ड्राइवर भी इस निर्देश का सख्ती से पालन करते दिखे। नगरकोट में रहनेवाले अधिकांश लोग तमांग और गुरूंग जाति के हैं। वे बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। चोटी पर एक सुन्दर होटल और एक रेस्तरां बना हुआ था। उस स्थान को एक पिकनिक स्पॉट के रूप में विकसित किया गया है। कुछ देर घूमने के बाद इस क्लब हिमालया में हमने चाय और स्नैक्श लिया। वेज पकौड़ा, होम फ्राइज वास्तव में स्वादिष्ट थे।
ऊँची चोटी से हमने पूर्वी हिमालय की चोटियों के दर्शन किए। घाटियों का दृश्य बहुत ही मनोरम था। रेस्तरां से कुछ दूरी पर एक टीला बना हुआ था। पर्यटक यहीं से सूर्यास्त के सूर्य का दर्शन करते हैं। हम जैसे ही वहाँ पहुँचे, बारिश शुरू हो गई। भागते हुए हम लोग वापस रेस्तरां आ गए। बारिश थमने के बाद ही वहाँ फिर से पहुँच सके। वहाँ से समूची काठमाण्डू घाटी दिख रही थी। अगर आसमान साफ रहे तो यहाँ से एवरेस्ट सहित बहुत सारी बर्फीली चोटियाँ देखी जा सकती हैं। वास्तव में नगरकोट नेपाल के शाही परिवार और शीर्ष अधिकारियों का समर रिट्रीट रहा है।
आज यहाँ पश्चिमी दिशा में काफी बादल थे और सूर्यास्त देखना सम्भव नहीं लग रहा था। प्रकृति की मनोरम छवियों को देख पाने के लिए एक आम पर्यटक का सिर्फ गन्तव्य तक पहुँचना काफी नहीं होता। उसे तो भाग्य के सहारे की आवश्यकता होती है, खासकर तब जब प्रसंग पर्वतीय भ्रमण स्थलों पर सूर्योदय अथवा सूर्यास्त देखने का हो। शाम 7 बजकर 13 मिनट पर सूर्यास्त के समय तक हम वहीं रुके रहे।
अचानक बादल छँटने लगे और थोड़ी ही देर में आसमान साफ भी हो गया। भाग्यवश मिले इस अवसर का हमने खू़ब आनन्द उठाया। चटक लाल रंग के बड़े आकार के सूर्य को पर्वत श्रृंखलाओं के पीछे छिपते हुए देखना एक दार्शनिक अनुभूति थी। फिर भी सबसे अच्छा सूर्यास्त अक्टूबर-नवम्बर माह में ही दिखता होगा। उस मौसम में आसमान में बादल नहीं होते। यह नगरकोट नेपाल के लोगों के लिए भी एक हिल स्टेशन है। चूँकि पूरा नेपाल ही पर्वतों पर बसा हुआ है, अतः इस हिल स्टेशन के बारे में कोई भी आसानी से समझ सकता है।
अब हम वापस काठमाण्डू लौट चले।होटल में फ्रेश होने के बाद हम पैदल काठमाण्डू नगर भ्रमण के लिए निकल गए। निकलते ही हम स्वप्न बगइचा (गार्डन ऑफ ड्रीम्स) पहुँचे। टिकट लेकर करीब शाम साढ़े सात बजे हमने परिसर में प्रवेश किया। हम जैसे सपनों की दुनिया में थे। रात्रि में यह बाग हल्की रोशनी से जगमग कर रहा था। छोटी-छोटी झीलें बनाई गई थीं जिसमें ढेर सारे कमल खिले थे। इस स्वप्न बगइचा को छः ऋतुओं का बगीचा (गार्डन ऑफ सिक्स सीजन्स) भी कहते हैं। इन छः ऋतुओें के प्रतीकस्वरूप छः बड़े-बड़े हॉल बनाए गए हैं। बिल्कुल प्रशान्त वातावरण। पानी में रहनेवाले जीवों की आवाजें मात्र सुनाई पड़ रही थीं। बगीचे में घूमते कुछ ही लोग। अधिकांश विदेशी थे। दरअसल इस बगीचे के आसपास विभिन्न देशों के दूतावास हैं। वही लोग शाम को टहल रहे थे। कई स्थानों पर बैठने के लिए स्थाई कुर्सियाँ बनी हुई थीं। एक शानदार रेस्तरां भी था। यह स्थान काठमाण्डू के सर्वाधिक मनमोहक स्थलों में से एक है।
19वीं सदी के तीसरे दशक में ब्रिटेन के एडवर्ड शैली के बागों से प्रभावित होकर इस बाग़ को फील्ड मार्शल कैशर शमसेर ने बनवाया था। इस बगइचा का निर्माण सन् 1920 में हुआ था। इसके वास्तुकार किशोर नरसिंह थे जिन्होंने दरबार स्क्वायर स्थित सिंह दरबार (वर्तमान में नेपाल सरकार का मन्त्रालय) को भी डिज़ाइन किया था। यह बाग कैसर शमशेर की निजी सम्पत्ति था जो उसकी मृत्यु के बाद नेपाल सरकार को हस्तान्तरित हो गई। परन्तु नेपाल सरकार ने इस बाग की क़द्र नहीं की। फिर तो यह गुमनामी के अन्धेरे में कहीं खो गया।
बहुत बाद में जाकर सरकार ने इसकी सुध ली। फिर आस्ट्रियाई सरकार की मदद से सन् 2000 से 2007 के बीच इसका पुराना वैभव लौटाया जा सका। मगर यह बाग मूल बाग के क्षेत्रफल का अब आधा ही रह गया है। मुख्य द्वार पर संगमरमर की दीवारों पर उमर खैय्याम की रूबैय्यात को भी उकेरा गया है। रंगबिरंगी विद्युत रौशनियों से नहाए फव्वारों का दिलकश नज़ारा इस स्वप्न बगइचा को चार चाँद लगा रहा था। हम यहाँ सूर्यास्त के बाद पहुँचे थे। सम्भव है कि दिन में सूर्य की रोशनी में यह उतना मोहक न होता। एक घण्टे रुकने के बाद हम यहाँ से बाहर निकल सके।
अम्लान ने सुबह माउण्ट एवरेस्ट का साक्षात् दर्शन किया था। उसकी इच्छा एक पोस्टर खरीदने की थी जिसे वह फ्रेम कराकर ड्राईंगरूम में लगाने की सोच रहा था। ठमेल के बाजार में माउण्ट एवरेस्ट का शानदार पोस्टर खरीदा गया। उसके बाद बाजार घूमते रहे। इस बाजार में भारतीय पर्यटकों की संख्या नहीं के बराबर थी। विदेशी पर्यटकों से यह बाज़ार भरा हुआ था। दुकानों पर विदेशियों की भारी भीड़, नाचघरों में नाचते विदेशी, रेस्तरां में खाना खाते विदेशी ही दिखे। आज हम लोगों ने दरबार रोड पर चहलकदमी की। पिज्जा हट में खाना खाया और रात्रि 10:00 बजे तक होटल लौटे।
नेपाल यात्रा का आज दूसरा दिन था।
तीसरा दिन: त्रिशूली नदी से फीवा झील तक
सुबह 6:30 बजे सोकर उठे। होटल में ही सुबह का नाश्ता किया। आज हमें पोखरा के लिए निकलना था। हम ठीक 8:30 बजे निकल पड़े। हमारी स्कॉर्पियो जीप का ड्राइवर मैक था। काठमाण्डू घाटी होते हुए हम नीचे उतर रहे थे। पिछले 15 वर्षों में काठमाण्डू का काफी विस्तार हो चुका है। सड़कें अब काफी चौड़ी हैं। अधिकांश सड़कें सीमेंट-कांक्रीट की हैं। चक्कर खाती सड़कों के रास्ते हम तेजी से आगे बढ़ रहे थे। वैसे तो रास्ते घुमावदार थे परन्तु सड़कों की चौड़ाई अधिक होने से गाड़ी की गति तेज थी।
हम जिस सड़क पर थे उसका निर्माण नेपाल ने चीन की मदद से वर्ष 1967 में आरम्भ कराया और वर्ष 1974 तक यह बनकर तैयार हो गई थी। काठमाण्डू से 25 कि.मी. आगे रास्ते में मिले नौबीसे के पास यह मार्ग त्रिभुवन पथ से मिलता है। इस त्रिभुवन पथ को भारत की सहायता से वर्ष 1956 में पूरा किया गया था। यह सड़क भारत की सीमा पर स्थित रक्सौल को नौबीसे से जोड़ती है। इसी सड़क पर नेपाल की पहली नियमित बस सेवा प्रारम्भ हुई थी। कुल 158 कि.मी. लम्बी यह सड़क इतनी घुमावदार है कि जहाँ हैतोड़ा से नौबीसे तक पहुँचने में बस को 107 कि.मी. की दूरी तय करनी पड़ती है वहीं एक कौवे को उड़ा दिया जाए तो उसे मात्र 32 कि.मी. उड़ना पडे़गा। ड्राइवर मैक ने नौबीसे कस्बे के नाम को 180 (9×20) बताया।
पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए हम दो घण्टे बाद फिस्लिंग पहुँचे। यह स्थान त्रिशूली नदी पर होने वाले वाइट वाटर रिवर राफ्टिंग के लिए प्रसिद्ध है। हमारी मुलाकात गाइड कटक गुरुंग से हुई। गुरुंग ने रिवर राफ्टिंग से सम्बन्धित बुनियादी बातें बताईं। चाय लेने के बाद लाइफ जैकेट, हेलमेट और पैडल के साथ नदी तट की ओर रवाना हुए। इसके पहले कभी हमने राफ्टिंग की नहीं थी। हिमांचल यात्रा के दौरान कुल्लू से मनाली को जाते हुए पचासों ऑपरेटर दिखे थे। परन्तु बेटे और मेरी भरपूर कोशिशों के बावजूद हम कविता को नहीं मना पाए थे। इस बार तो मैंने टूर ऑपरेटर को बताकर यात्रा पर रवाना होने के पहले ही राफ्टिंग को प्रोग्राम में जुड़वा लिया था। ऐसी स्थिति में ना करने का प्रश्न नहीं था। फिर भी डरते-डरते ही राफ्ट पर सवार हुए।
मुझे, मेरी बेटी और बेटे को तैरना आता है। कविता के लाइफ जैकेट को भली-भाँति चेक किया और राफ्ट को त्रिशूली की उछलती गरजती लहरों में जाने दिया। राफ्ट के बीच पानी में पहुँचते ही पहला रैपिड आया और हम सब उत्तेजना से चिल्लाते हुए ठण्डे पानी से तर बतर हो चुके थे। कैमरे और सेलफोन को गीला होने से बचाने की व्यवस्था राफ्ट में थी। तीन-चार रैपिड के बाद तो हम इसके अभ्यस्त हो चले थे। उस दौरान हमारी राफ्ट लहरों के कारण कई फीट ऊपर उछल जाया करती।
कई बार हम अस्थिर हुए और दो बार राफ्ट के अन्दर असन्तुलित होकर गिरे भी। परन्तु कुछ दूर शान्त पानी आने के बाद यह महसूस होता कि अरे! रैपिड मिल क्यों नहीं रहा। फिर कहीं आगे जाकर एक कि.मी. लगातार शान्त पानी मिला। गुरूंग ने दोनों बच्चों को नदी में उतार दिया। अब वे खुली नदी में थे। गुरुंग ने बताया कि इस स्थान पर नदी की गहराई 100 फीट से अधिक है। उसके यह बताते ही हमने दोनों को वापस राफ्ट में खींच लिया। परन्तु उतनी देर बच्चों ने बहुत अच्छा महसूस किया। इसके आगे तो राफ्ट को जहाँ अधिकतम उछाल मिल सके वहीं ले जाने की कोशिशों में लगे रहे।
त्रिशूली नदी तिब्बत से निकलती है जहाँ इसे किरोंग सांगपो कहते हैं। दन्तकथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने गोर्साइंकुण्ड में अपने त्रिशूल से भूमि को दे मारा था। इस कारण वहाँ तीन झरने प्रकट हुए। कहते हैं, इन्हीं झरनों से त्रिशूली नदी का जन्म हुआ है। तिब्बती भाषा में ल्हासा के पश्चिमी भाग सांग से निकलनेवाली नदियों को सांगपो कहते हैं। राफ्ट में बैठकर प्राकृतिक सौन्दर्य का नज़ारा लेना अद्भुत आनन्द है। त्रिशूली नदी के किनारे-किनारे ही सड़क बनी हुई थी। सड़क पर चलते वाहनों की आनेवाली आवाजें थीं तो बहुत कम परन्तु वे भी कष्ट दे रही थीं। पानी की आवाज, पक्षियों के कलरव हमें सुखद अहसास प्रदान कर रहे थे।
पर्वत श्रृंखलाओं के दृश्य, नाना प्रकार के वृक्ष, नदी के खूबसूरत तट आँखों को सुकून दे रहे थे। इन रोमान्च के पलों को महसूस करते-करते कब तीन घण्टे गुजर गए, हमें पता ही नहीं चला। मनकामना मन्दिर को जानेवाले रोपवे के बेस स्टेशन पहुँचने तक हम 14 किमी. राफ्टिंग कर चुके थे।
वहाँ पहुँचने के बाद हम कुछ देर तक तो पानी में ही रहे। कपड़े पहले से ही गीले थे। वहाँ एक अंग्रेज सूर्य को अर्ध्य दे रहा था। बहुत विचित्र लगा। अंग्रेज और सूर्य की उपासना! वह भी हिन्दू रीति रिवाज से! मैंने अपने सेलफोन से स्नैप भी लिया। इसी विषय में चर्चा करते हम ऊपर रेस्तरां में पहुँचे।
दोपहर का लन्च राफ्टिंग करानेवाली एजेन्सी की ओर से था। एकदम साफ-सुथरा, सुव्यवस्थित कैम्पस और चमचमाते बाथरूम। कपड़े बदलकर हमने नेपाली थाली का लुत्फ उठाया। बहुत ज़ोरों से भूख लग रही थी। नेपाल का सामान्य भोजन चने की दाल, भात, तरकारी और अचार के साथ दही है। खाने में नेपाली स्वाद हमें काफी पसन्द आया। तब तक हमारा ड्राइवर मैक वहाँ आ चुका था।
इस रोमान्चक रिवर राफ्टिंग के बाद हम पोखरा की ओर निकल गए। हमने हिमांचल यात्रा के दौरान व्यास नदी में राफ्टिंग क्यों नहीं की थी, आज इसका काफी अफसोस हुआ। जाते समय गाइड कटक गुंरूग ने हमें अगली यात्रा के समय राफ्टिंग करते हुए चितवन नेशनल पार्क तक नदी यात्रा के लिए आमन्त्रित किया। हमने सहर्ष स्वीकार किया।
दस मिनट के सफर के बाद हम मुगलिंग में थे। अब तक हम काठमाण्डू से आगे 111 कि.मी. की दूरी तय कर चुके थे। किसी को भी भारत अथवा पोखरा से आते समय सड़क मार्ग से काठमाण्डू जाने के लिए इस छोटे से कस्बे में आना ही पड़ेगा। पोखरा जाने के लिए त्रिशूली नदी पर पुल इसी शहर में बना है। पुल के पहले एक सड़क भारतीय सीमा की ओर जाती है। कस्बे में इस सड़क से गुज़रती प्रत्येक बस, लन्च अथवा डिनर के लिए अवश्य रुकती है। यहाँ पचासों रेस्तरां हैं जहाँ बहुत स्वादिष्ट भोजन मिलता है। अधिकांश रेस्तरां उत्तम भोजन तैयार करनेवाली थकाली और गुरूंग जातियों के लोग चलाते हैं। एक शाकाहारी मारवाड़ी बासा भी दिखा।
पुल पार करने के बाद हम तेजी से पोखरा की ओर बढ़े। दाईं ओर गहरी घाटियाँ और बादलों से लिपटी ऊँची-ऊँची चोटियाँ दिखीं। इसी पृथ्वी राजमार्ग पर एक कस्बा, अबु खैरेनी आया। यहाँ से 24 कि.मी. उत्तर में गोरखा नाम का स्थान है। सन् 1769 में यहीं के राजा पृथ्वीनारायण शाह ने काठमाण्डू घाटी पर अधिकार कर नेपाल के एकीकरण का कार्य पूरा किया था। इसी राजा के नाम पर इस राजमार्ग का नाम रखा गया है। जो श्रद्धालु, रोपवे से मनकामना मन्दिर नहीं जा पाते, वे यहीं बस स्टैण्ड से सीधी चढ़ाई करते हुए मन्दिर तक पहुँच सकते हैं। चढ़ाई में 3 से 4 घण्टे लगते हैं।
त्रिशूली नदी को तो हम मुगलिंग में ही छोड़ आए थे। अब मरस्यांग्दी नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ रहे थे। 11 कि.मी. दूर डुम्रे कस्बे तक यही स्थिति बनी रही। पर्वत की तलहटियों में सघन वन थे और नीचे गहरी घाटी में तीव्र जलधारा प्रवाहित हो रही थी। मरस्यांग्दी नदी का यह जल मुगलिंग के पास त्रिशूली नदी में जा मिलता है।
घाटियों में धान के खेत अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। इसके आगे 8 कि.मी. दमौली तक घाटी चौड़ी हो गई थी। दमौली कस्बा मादी और सेती नदी के संगम पर बसा हुआ है। इस प्रयाग (संगम) का धार्मिक महत्व भी है। दमौली में ही इस नदी के किनारे व्यास गुफा नामक एक पवित्र स्थान है। कहते हैं, महर्षि वेदव्यास का जन्म यहीं हुआ था और वे इस स्थान पर काफी समय तक रहे भी थे। दमौली बड़ा कस्बा है जिसे पार करने के बाद हमें मादी नदी मिली। इस नदी के चौडे पाट पर बना पुल भी काफी लम्बा था। और देखते ही देखते हम पोखरा घाटी के द्वार पर आ खड़े हुए। यहाँ से पोखरा 54 कि.मी. दूर था। हाँ, मुझे याद आया, भोपाल में हमारे मोहल्ले का चौकीदार रामप्रकाश इसी दमौली के आसपास बर्दिया का रहनेवाला है।
किन्तु पोखरा से ठीक 50 कि.मी. पहले पीपलराहा कस्बे में पहुँचे ही थे कि अचानक मौसम खराब होने लगा। ऊँची पर्वत चोटियों से उतरते हुए घने बादलों ने सड़क को पूरी तरह अपने आवरण से ढंक दिया। दृश्यता करीब-करीब समाप्त हो गई थी। अत्यधिक तेज वर्षा ने हमारा मार्ग रोक लिया। 10 मीटर आगे तक कुछ नहीं दिख रहा था। बहुत डरावना था यह सब देखना। हम बादलों के बीच फंसे थे और तेज बारिश आगे बढ़ने नहीं दे रही थी। हम सड़क किनारे रुक नहीं सकते थे। धीरे-धीरे ही सही लेकिन आगे बढ़ते रहे। करीब 45 मिनट बादलों और बारिश के मध्य फंसे रहने के बाद ही इससे बाहर आ पाए। हम अब पोखरा शहर की नगरीय सीमा में थे। पोखरा पहुँचने से पहले यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता हमारे सफर की थकान को पलभर में ही दूर कर गई। रास्ते भर हम खिड़कियों के बाहर झांकते अपलक इन पहाड़ों की सुन्दरता को निहारते रहे।
मुझे याद है कि 15 वर्ष पूर्व काठमाण्डू से पोखरा आने में हमें 7 घण्टे से अधिक का वक्त लगा था। परन्तु आज हमने इस 202 कि.मी. की दूरी को साढ़े चार-पाँच घण्टे में ही नाप लिया। पोखरा नगर काठमाण्डू के मुकाबले अधिक नियोजित दिखा। सड़क के दोनों ओर 50-50 फीट के दायरे में कोई निर्माण नहीं था। हमारा होटल फीवा झील के किनारे था। शीघ्र ही हम पृथ्वी चौक पार करते हुए लेक साइड आ गए। ड्राइवर मैक ने बताया कि पहले इस चौक पर राजा पृथ्वीनारायण शाह की प्रतिमा लगी हुई थी परन्तु माओवादी आन्दोलन के दौरान राजशाही के विरोधस्वरूप इसे ध्वस्त कर दिया गया था। फिर भी यह क्षेत्र पृथ्वी चौक के नाम से ही जाना जाता है।
अन्धेरा होते-होते हम अपने होटल कान्तिपुर पहुँच गए थे। चेकइन कर फ्रेश हुए और आधे घण्टे बाद पैदल भ्रमण पर लेक साइड निकल पड़े। 15 वर्ष पूर्व के पोखरा और आज के पोखरा में जमीन आसमान का फर्क दिखा। आज समूचा क्षेत्र चमचमाते रेस्तराओं, ट्रेवल एजेन्सियों और विविध प्रकार वस्तुओंवाली दुकानों से सुसज्जित है। भारतीयों के मुकाबले विदेशी पर्यटक बहुतायत में थे। यहाँ के रेस्तराओं में चाईनीज, कान्टीनेन्टल, थाई, कोरियाई व्यंजनों की भरमार थी। भारतीय भोजनवाले रेस्तरां एक-दो ही दिखे। कई रेस्तराओं में लोक नृत्य और संगीत का आयोजन भी था। इस क्षेत्र में नेपाली चुलू अर्थात् नेपाली भोजन का स्वाद गीत-संगीत-नृत्य के साथ लिया जा सकता है, खालिस नेपाली अन्दाज में। ट्रेवल गाइड, ट्रेकिंग, पैराग्लाईडिंग और अल्ट्राफ्लाइट आयोजित करनेवाली एजेन्सियाँ भी पर्यटकों से अटी पड़ी थीं। लेक साइड की सड़क अब काफी चौड़ी दिखी। काफी देर तक हम इसी क्षेत्र में घूमते रहे। एक रेस्तरां में डिनर लेकर रात्रि 10:30 बजे तक वापस होटल लौटे। फीवा लेक के किनारे स्थित इस होटल, कान्तिपुर में भी विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में रुके हुए थे।
नेपाल यात्रा का आज तीसरा दिन था।
चौथा दिन: फीवा लेक
सुबह हम नाश्ता करके फीवा लेक के लिए निकले। होटल से दो मिनट पैदल चलने के बाद ही हम बोट क्लब आ गए थे। फीवा नेपाल की सर्वाधिक आकर्षक झील है। गहरे हरे रंग का स्वच्छ पानी और पृष्ठभूमि में अन्नपूर्णा श्रृंखला के ऊँचे-ऊँचे पर्वतों ने पोखरा को नेपाल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्यटन केन्द्र बना दिया है। आज पोखरा में 2 फाइव-स्टार होटल सहित 305 होटल हैं। फीवा झील के खूबसूरत तटों पर तीन बोट क्लब हैं जिनमें वराही मन्दिर के ठीक सामनेवाला बोट क्लब बड़ा और सबसे व्यस्त है। इसी फीवा झील के नाम पर इस शहर का नाम पोखरा पड़ा है।
झील की दाईं ओर हरपन खोला, एक नाला है जो बर्फीली चोटियों से ताजा जल इस झील में लाता है। दूसरी ओर एक डैम बनाकर इसका जल रोका गया है जहाँ डेविस फॉल है। इस झील के उत्तर-पूर्व का क्षेत्र लेक साइड एरिया कहलाता है।
बोट क्लब के पास पहुँचकर हम पार्क में काफी देर तक बैठे रहे। इसकी नैसर्गिक खूबसूरती का आनन्द लेते रहे। प्रशान्त जल, अद्भुत प्राकृतिक हरीतिमा, आँखों को सुकून देते पक्षियों के झुण्ड, बैकड्रॉप के स्थान पर ऊँचे पर्वत, निःशब्द वातावरण और तटों से लगी रंगबिरंगी नौकाएँ- समूचा दृश्य मनमोहक था। 18 वर्ष पूर्व इसी झील में हम दोनों ने जी भरकर नौका यात्रा की थी। 400 नेपाली रुपए और 10 रुपए प्रति लाइफ जैकेट प्रतिघण्टे की दर से किराया चुकाने के बाद हमने नौका यात्रा प्रारम्भ की। बमुश्किल आठ-दस नौकाएँ उस समय झील पर तैर रही थीं। आधे घण्टे की बोटिंग के बाद हमने वराही मन्दिर जाने का निर्णय लिया।
वराही मन्दिर पोखरा का सर्वाधिक प्रसिद्ध हिन्दू मन्दिर है। पैगोडा शैली में बना यह मन्दिर फीवा झील में बीचो-बीच एक छोटे से टापू पर बना हुआ है। 18वीं सदी में बना यह मन्दिर भगवान विष्णु के वाराह अवतार को समर्पित है। मन्दिर पहुँचकर हमने भी प्रतिमा के दर्शन किए। टापू पर सैकड़ों कबूतर थे। कबूतरों को सभी दाना डाल रहे थे, हमने भी डाला। आधा घण्टा समय बिताने के बाद हम झील के दूसरी तरफ मूनडांस रेस्तरां पहुँचे। इसी रेस्तरां के बाजू से वर्ल्ड पीस पैगोडा का रास्ता जाता है। मेरे अलावे हममें से कोई भी ऊपर जाने को तैयार नहीं था। इस स्थान से पोखरा शहर का लेक साइड एरिया बहुत खूबसूरत दिख रहा था। रेस्तरां के आसपास का माहौल बिल्कुल शान्त था। झील अपने अधिकतम फैलाव में बहुत आकर्षक दिख रही थी। पहाड़ों की वादियों से सजे इस शहर में माछेपूछे के साथ-साथ अन्य पहाड़ों की छाया, जब झील के लहराते पानी पर पड़ रही थी तो उस समय का दृश्य ऐसा लग रहा था मानो किसी कलाकार ने अपनी कला को अन्जाम दे दिया हो। कुछ देर चहलकदमी के बाद हम वापस लेक साइड की ओर लौट चले।
कश्मीर यात्रा के दौरान हमने डल झील देखी थी। हाउसबोट में रुके थे और घण्टों शिकारा राइड भी किया था। राइड के दौरान मैंने मिनरल वाटर के एक खाली बॉटल में डल झील के पानी को भरकर देखा। पानी बहुत गन्दा था। झील में पानी के नीचे हरे रंग का शैवाल “हिल” भी बहुतायत में दिखा था। हिल काफी ऊपर तक और पूरे क्षेत्र में फैला हुआ था। हाउसबोटों के कारण भी पानी गन्दा होता है। फिर डल झील में सैलानियों की बड़ी संख्या पर्यटन के लिए आती है। वहीं फीवा झील का पानी एकदम स्वच्छ था। पर्यटकों की अपेक्षाकृत कम संख्या और हाउसबोटों के नहीं होने की वजह से यह झील प्रदूषण से सर्वथा मुक्त है। अन्नपूर्णा श्रृंखला के पर्वतों के पृष्ठभूमि में होने से इसकी खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं।
किन्तु संकट यहाँ भी है। पर्यावरण सम्बन्धी अध्ययन की वर्ष 1993 की एक रिपोर्ट के अनुसार इस झील का अस्तित्व आगामी 200 वर्षों में समाप्त हो जाएगा। इसका उत्तर-पश्चिमी भाग तो अगले 25 वर्षों में ही पुर जाने वाला है। इस झील में शैवाल का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। इसके कारण भी इस झील का आकार कम होता जा रहा है। पर्यावरण से सम्बन्धित दो-एक संगठनों के श्लोगन भी दिखे। वर्ष 1974 में फीवा झील का डैम ध्वस्त हो गया था। जिस कारण पूरी झील खाली हो गई थी। झील के क्षेत्र में सर्वाधिक अतिक्रमण उन्हीं दिनों हुआ, जिसका असर इसके आकार पर पड़ा है। देर तक हम वहाँ रुके।
आज का लन्च होटल में ही करने की इच्छा के साथ वापस होटल लौटे। पिछले तीन-चार दिनों से हम तकरीबन रोज़ 8-10 कि.मी. पैदल चल रहे थे। आज दोपहर में आराम करने का निर्णय लिया गया। शाम के चार बजे सोकर उठे। पोखरा में प्रतिदिन दोपहर तीन से चार बजे के बीच वर्षा होती ही है। कल रास्ते में आते समय हुई थी। आज भी हो रही थी। मैंने पिछली दोनों यात्राओं में भी बारिश देखी थी। होटल की बालकनी में कुर्सी डालकर बारिश का आनन्द लेते रहे। पहाड़ों की तलहटी, झील का किनारा, खूबसूरत पोखरा शहर अद्भुत आनन्द आ रहा था! कुछ देर बाद लगभग पाँच बजे तक वर्षा बन्द हो गई।
पोखरा की वार्षिक वर्षा 131 ईंच प्रतिवर्ष है जबकि भोपाल में मात्र 45 ईंच है। वैसे आज हमारा इरादा समूचे लेक साइड घूमना और 18 वर्ष पूर्व जिस होटल सम्राट में हम रुके थे उसे ढूंढ निकालना था। पोखरा के पश्चिमी ओर झील के किनारे-किनारे मुख्य सड़क से हटकर समूचे झील की लम्बाई में पैदल घूमने के लिए पक्की पगडन्डियाँ बनी हुई हैं। ये पगडन्डियाँ दूसरे व तीसरे बोट क्लब को आपस में जोड़ती भी हैं। शाम के समय बोटिंग करने का आनन्द कुछ और ही था। जहाँ अधिकांश भारतीय पर्यटक बोट से वराही मन्दिर के टापू पर जाने में लगे हुए थे वहीं सभी विदेशी पर्यटक बोट लेकर झील में काफी दूर तक जाते दिखे। बहुत सारे युवा पर्यटक नाव के साथ-साथ तैरते हुए भी नज़र आ रहे थे। सैकड़ों पर्यटक झील के किनारे पैदल टहल रहे थे। पश्चिम का क्षितिज नीले रंग का होकर एक विचित्र प्रकार की आभा फैला रहा था।
बोटिंग के दौरान बोटवाले ने हमें दूर से होटल सम्राट दिखाया। हमारे पास शाम का समय खाली था। इसका उपयोग हमलोगों ने पोखरा शहर को नज़दीक से देखने समझने में किया।
वर्ष 1968 तक पोखरा एक गुमनाम कस्बा हुआ करता था। तब पोखरा को शेष नेपाल से जोड़नेवाली प्रथम सड़क सिद्धार्थ राजपथ के पहले यहाँ के निवासी पैदल यात्रा करते थे। 18वीं सदी में कास्की के राजा (पोखरा इसी राज्य में आता था) ने भक्तपुर के नेवार व्यापारियों को पोखरा में बसने के लिए आमन्त्रित किया था। आज पोखरा के मुख्य व्यापारिक क्षेत्रों में ये अधिक संख्या में रहते हैं और शहर की व्यावसायिक गतिविधियों पर इनका ही दबदबा है। पोखरा के बहुसंख्यकों को खास कहा जाता है जिनमें ब्राह्मण (बहुन), क्षत्रिय (छेत्री), ठाकुरी और दलित आते हैं। फीवा झील के किनारे मांझी जाति के लोग रहते हैं जबकि मुसलमानों की एक छोटी आबादी मियां पाटन क्षेत्र में रहती है। बतुलेचैर क्षेत्र, जो पोखरा के उत्तर में है, में गन्धर्व (गाईने) रहते हैं। यह गन्धर्व जनजाति अपना जीवनयापन गायन-वादन पर करती है।
आज भी ब्रिटेन और भारत के सैन्य अधिकारी इस शहर में बने अपने कैम्पों में नेपालियों, विशेषकर मगार और गुरूंग जाति के लोगों की सेना में भर्ती करते हैं। ब्रिटिश कैम्प पोखरा के उत्तर-पूर्व में दीप हाईट्स में है जबकि भारतीय कैम्प शहर के दक्षिण-पश्चिम हिस्से के राम बाज़ार में है। ये कैम्प सैनिकों की भर्ती के अलावा पेन्शन भुगतान एवं अन्य सुविधाएँ भी मुहैया कराते हैं। इन कैम्पों के कारण ही पोखरा में खासों के अतिरिक्त मगारों और गुरूंगों का प्रभुत्व स्थापित हो गया है। शहर के दो घण्टे के भ्रमण के बाद ये सारी जानकारियाँ प्राप्त हो सकीं। ड्राइवर मैक ने भी हमारी काफी मदद की।
समुद्र तल से मात्र 827 मीटर की ऊँचाई पर स्थित पोखरा से नेपाल की तीन सर्वोच्च चोटियाँ- धौलागिरि, अन्नपूर्णा और मनास्लू- मात्र 30 कि.मी. की परिधि में स्थित हैं जबकि इससे अधिक ऊँचाई पर स्थित काठमाण्डू से ये चोटियाँ ठीक से दिखाई भी नहीं पड़तीं। इसी कारण अन्नपूर्णा ट्रैकिंग सर्किट बन जाने से पोखरा तेजी से उभरता हुआ पर्यटन केन्द्र बन गया है। पोखरा से सबसे नजदीक चोटी फिशटेल है जिसकी ऊँचाई 6993 मीटर है। इस नगर पर प्रकृति कुछ ज्यादा मेहरबान है।
नगर भ्रमण के बाद हम लेक साइड मार्केट में पैदल निकल पड़े। पूरा बाजार चकाचौंध था। सैकड़ों सैलानियों की भीड़ बाजार में थी। प्रत्येक रेस्तरां फुलपैक था। शाकाहारी होटल तो थे ही नहीं। वैसे होटल, जहाँ शाकाहारी भोजन मिल सकता था, के 90 प्रतिशत व्यंजन, मांसाहारी ही थे। खैर, पेट तो भरना ही था। एक होटल में मनपसन्द भोजन मिला। रात्रि के 9:30 बज चुके थे। वापस होटल आकर कल सुबह सरांगकोट जाने के लिए टैक्सी की व्यवस्था की और रात्रि 10:30 बजते-बजते सो गए।
नेपाल यात्रा का आज चैथा दिन था।
पाँचवां दिन: सरांगकोट से बेगनास झील तक
सुबह 3:30 बजे सोकर उठे। टैक्सीवाले का फोन भी 4:00 बजे आ गया था। हम फटाफट तैयार होकर सरांगकोट के लिए निकल पड़े। अभी पूरी तरह से अन्धेरा था। चाँदनी रात थी। दूधिया चाँदनी के प्रकाश में सारा पोखरा शहर नहाया हुआ था। ड्राइवर विकास हमें सरांगकोट तक ले जाने के लिए तेज गति से गाड़ी चला रहा था। पोखरा शहर के निकलते ही तीखी चढ़ाई प्रारम्भ हो गई। अब बाईं ओर नीचे की तरफ रौशनी से जगमगाता पोखरा शहर दिख रहा था। करीब आधे घण्टे की ड्राइव के बाद अपने गन्तव्य तक पहुँच गए थे। इसके आगे अब हमें पैदल चढ़ाई करनी थी।
हमने ऊपर गाड़ी छोड़ी। उस समय हम 1592 मीटर की ऊँचाई पर थे। यहाँ से चोटी तक पहुँचने के लिए पैदल चढ़ाई प्रारम्भ हुई। तब तक रात्रि ढल चुकी थी। इस रौशनी में हम चढ़ाई कर सकते थे। सूर्योदय 5 बजकर 13 मिनट पर होना था और इसके पूर्व चोटी पर पहुँच जाना चाहते थे। करीब एक घण्टे की सीधी चढ़ाई के बाद हम ऊपर पहुँच पाए। समूची घाटी नीलाभ लिए हुए थी। यहाँ से हम समूची पोखरा घाटी देख सकते थे। परन्तु सूर्योदय देखने के लिए हमें दाईं ओर की ढलान पर रुकना था।
चोटी पर दो-एक व्यापारियों ने छोटी-छोटी दुकानें बना रखी हैं। इनमें सुबह की चाय, कॉफी और पकौड़े मिल सकते थे। एक दुकानवाले ने ढलान पर सूर्योदय देखने के लिए एक शेड और बैठने की व्यवस्था भी बना रखी थी। उसने आवाज दी तो हम उसी शेड में पहुँचे। उस दिन सूर्योदय देखने के लिए सरांगकोट चोटी पर पहुँचनेवाले हम प्रथम पर्यटक थे। थोड़ी देर के बाद धीरे-धीरे और लोग आ गए। परन्तु अधिकांश पर्यटकों ने सूर्योदय नीचे सरांगकोट बस्ती से ही देखा। चोटी तक पहुँचनेवालों की संख्या बहुत कम थी।
यह स्थान बहुत ही मनोरम था। यहाँ सैकड़ों रंगबिरंगे पक्षियों की चहचहाहट सुनी जा सकती थी। सुबह-सुबह वहाँ पर बहुत सारी तितलियाँ भी उड़ रही थीं। नीचे सेती नदी का श्वेत जल बहता हुआ दिख रहा था। इसी नदी के किनारे तिब्बती शरणार्थियों का गाँव हेमजा भी दिखा ठीक सामने अन्नपूर्णा श्रृंखला की शीर्ष चोटियाँ स्पष्ट दिख रही थीं। धौलागिरी, अन्नपूर्णा-एक और दो, मच्छापुछारे (मछली की पूँछ, फिशटेल) सहित दसियों चोटियों को हमने जी भर के देखा। हम वास्तव में हिमालय की गोद में थे। आसमान बिल्कुल साफ था। सूर्योदय होने को था। ये सभी हिमाच्छादित चोटियाँ पहले नीली से सफेद, फिर पीली और अन्त में गहरे नारंगी रंग की हो गईं।
पर्वतों के बीच से सूर्योदय होने के पूर्व की लालिमा जैसे-जैसे विराट रूप ले रही थी, उसी क्षण पश्चिम दिशा में स्थित बर्फ की चादर ओढ़े हिमालय की अन्नपूर्णा श्रेणी और फिशटेल ऐसा दिखने लगा, जैसे किसी ने पूरे पर्वत की चोटियों पर रक्त चन्दन का लेप लगा दिया हो। और जैसे ही सूरज की पहली किरणें सामने स्थित पर्वतों को छूती हैं तब जो नज़ारा सामने आता है उसे बिना देखे उसकी कल्पना मात्र ही की जा सकती है। ऐसा लगता है जैसे सोना पिघलकर पर्वत के चारों ओर फैल रहा हो। जैसे-जैसे सूर्य की किरणें फैलती हैं, उसी के अनुसार पर्वतों का रंग बदलता रहता है। सूरज की पहली किरण के बर्फ पर पड़ने के साथ ही ऐसा लगा मानो उस समय सुनहरापन पहाड़ों का श्रृंगार कर रहा हो।
अन्ततः बर्फीली चोटियों में से झाँकते हुए सूर्य देवता अवतरित हुए। हम सब ने दोनों हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक उनका नमन किया। अद्भुत दृश्य था। इतना साफ और स्पष्ट सूर्योदय इसके पूर्व हमने कभी नहीं देखा था। लालिमायुक्त पर्वत फिर से बर्फ की सफेद चादरों से ढंक गए। लगा जैसे हम किसी अन्य लोक में हैं। पक्षियों की आवाज को छोड़कर चारों ओर स्तब्ध, निःशब्द वातावरण था। हम सम्मोहित से वहीं बैठे रहे। तभी दुकानवाले के चाय-काफी पूछने पर ध्यान टूटा। वह नेपालीभाषी दुकानवाला भी अजीब था। हम लोगों से उसने हिन्दी में बात की। पास ही एक यूरोपीय जोड़ा भी प्रकृति का आनन्द ले रहा था। दुकानवाले लड़के द्वारा पूछने पर जब उनके द्वारा यह बताया गया कि वे लोग हंगरी से हैं तब उनसे हंगेरियन भाषा में बातें शुरू कर दीं। अन्य लोगों से वह धाराप्रवाह अंग्रेजी में बातें तो कर ही रहा था।
पूरी तरह उजाला हो जाने के बाद हमने चोटी की दूसरी ओर से उतरने का निर्णय लिया। चायवाले ने बताया था कि यह रास्ता आसान है। वहाँ पर एक छोटी सी बस्ती थी। आगे चलने पर कुछ देर में ही समूची पोखरा घाटी दिखने लगी। पोखरा शहर और फीवा झील अब पूरे विस्तार में दिख रही थी। झील के शान्त पानी में दूसरी तरफ स्थित पहाड़ों की छाया स्पष्ट देखी जा सकती थी। ऊँचे पहाड़ पर स्थित विश्व शान्ति स्तूप को हम समान ऊँचाई से देख पा रहे थे।
फीवा झील को ताजे जल की आपूर्ति करनेवाले हरपन खोला को भी हमने देखा। यह खोला पहाड़ों से जल के साथ-साथ भारी मात्रा में मिट्टी, गाद आदि भी लाता है। इसके कारण झील के मुहाने के आसपास का बड़ा क्षेत्र उथला हो गया है। हम स्पष्ट देख पा रहे थे कि इस उथले क्षेत्र में लोगों ने खेती करना भी आरम्भ कर दिया है। इस झील पर हाल के वर्षों में आनेवाला यह एक बड़ा पर्यावरणीय संकट है।
18 वर्ष पहले के और आज के सरांगकोट में भी बड़ा फर्क आ गया है। तब इस पूरी पहाड़ी पर एक भी घर नहीं था। ऊपर एक सपाट मैदान था और सरांगकोट चोटी स्पष्ट दिखती थी। आज यह एक बस्ती के रूप में तब्दील हो चुका है और सड़कें, गलियाँ तंग हो गई हैं। तब इन दिनों पोखरा में ठण्ड भी अच्छी पड़ती थी। मुझे याद है, उस समय सवेरे-सवेरे जब सरांगकोट के लिए रवाना हुए थे तब हम लोगों ने होटल से कम्बल भी उठा लिया था। उस कम्बल की हमें वास्तव में ज़रूरत पड़ रही थी। मगर इस बार ठण्ड की एक हल्की सी सिहरन भर थी। समय बदल चुका है।
उस समय बिन्ध्यवासिनी मन्दिर के पास से अधिकांश लोग ट्रेकिंग करते हुए चोटी तक पहुँचते थे। ट्रेकिंग तो खैर आज भी होती है परन्तु ट्रेकिंग के दौरान मिलनेवाले प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द भला अब कहाँ? फिर भी ऊपर पहाड़ और नीचे झील, जंगल के रूप में नेपाल पर कु़दरत ने जमकर रहमत बरसाई है। वापस लौटते समय टैक्सी से समूचे लेक साइड का एक और चक्कर लगाया। होटल लौटकर हाथ मुँह धोने और नाश्ते के बाद ड्राइवर मैक हमें पोखरा शहर के पर्यटक स्थलों का भ्रमण कराने के लिए तैयार मिला।
हम सर्वप्रथम डैम साइड क्षेत्र परदी गए। यहाँ डेविस फॉल देखना था। हम 10 बजे वहाँ पहुँच गए थे। टिकट लिया, कैम्पस के अन्दर पहुँचे। डेविस फॉल वास्तव में फीवा लेक का वेस्टवियर है। हरपन खोला फीवा झील में पहाड़ों से ताजे़ पानी की आपूर्ति करता है। दूसरी ओर, एक डैम बनाकर पानी को स्थिर रखा गया है। इसका अतिरिक्त पानी, परदी खोला के रास्ते बाहर निकलता है और थोड़ी दूर आगे चलकर भूमिगत हो जाता है। इस खोला के भूमिगत होने के क्रम में एक जलप्रपात जैसी संरचना बनती है जिसे डेविस फॉल नाम दिया गया है।
किम्वदन्तियों के अनुसार, वर्ष 1961 में स्विस पर्यटक डेविस दम्पत्ति इस झरने की तीव्र धारा में, एक दूसरे को बचाने के प्रयास में डूब गए थे। इस कारण इस झरने का नाम डेविस फॉल पड़ा। परन्तु सच यह है कि एक देवी के नाम पर यह डेविस फॉल है। डेविस फॉल अर्थात् देवीज फॉल। नेपाली भाषा में इसे पाताले छांगो कहते हैं। प्रत्येक कोण से झरने में झाँका परन्तु इस फॉल में जल की छोटी धाराएँ ही दिखीं। हालांकि पानी गिरने के कारण तेज आवाजें अवश्य आ रही थीं। कहते हैं, करीब 100 फीट नीचे, 500 मीटर की लम्बाई में यह पानी बहता है। उसके बाद पुनः सतह पर आता है।
कुछ देर वहाँ रुकने के बाद हम गुप्तेश्वर महादेव की गुफाएँ देखने के लिए सड़क पारकर दूसरी ओर पहुँचे। वास्तव में यह पूरा क्षेत्र चूना पत्थरवाली चट्टानों पर बसा हुआ है। परदी खोला का पानी चूना पत्थर को गलाते हुए भूमिगत हो जाता है। इसी कारण यहाँ गुप्तेश्वर महादेव की गुफाएँ बनी हैं। दरअसल, इस मन्दिर में 40 मीटर नीचे बना शिवलिंग एक स्टेलेग्माईट आकृति है। यह चूना पत्थर पर पानी के प्रभाव के कारण निर्मित होता है। मन्दिर में प्रवेश के बाद हमें करीब 100 सीढि़याँ उतरनी पड़ीं। उसके बाद ही शिवलिंग का दर्शन हो पाया। पूजा अर्चना के बाद उतरने के लिए करीब 100 सीढि़याँ और थीं। हम नीचे उतरे और उतरते चले गए। सतह से करीब 100 फीट नीचे डेविस फॉल में भूमिगत हुई जल की धारा यहाँ हमें एक झरने की शक्ल में दिखी।
चन्द्रकान्ता के तिलस्म की तरह खिड़की खुलने पर एक अलग ही दुनिया नज़र आई। इस दृश्य को देखकर “अद्भुत” के अलावे और कोई विशेषण नहीं हो सकता। तीव्र गति और बड़ी जलराशि होने के कारण बहुत शोर हो रहा था। इसके बाद पानी कहाँ चला जाता है, यह बिलकुल समझ में नहीं आता। अन्धेरा भी वहाँ था। हम काफी गहराई में थे इस कारण सफोकेशन भी हो रहा था। झरना देखने के उपरान्त हम जल्दी से बाहर आ गए यह पूरा क्षेत्र अब बाजार के रूप में विकसित हो चुका है। नवनिर्माण अभी भी चल रहे थे। पिछले दोनों भ्रमण के दौरान यह पूरा क्षेत्र वीरान हुआ करता था।
इसके बाद हम बिन्ध्यवासिनी मन्दिर की ओर निकल गए। डेविस फॉल से बिन्ध्यवासिनी मन्दिर तक पहुँचने में हमें करीब 20 मिनट का समय लगा। पिछली यात्रा के मुकाबले अब यह मन्दिर परिसर बहुत विकसित हो चुका है। सीढि़याँ चढ़कर हम ऊपर आए। ऊपर का हिस्सा अब व्यवस्थित तरीके से अनेक मन्दिरों से भरा-पूरा दिखा। परिसर के बीचो-बीच मुख्य मन्दिर है जिसमें श्रद्धालुओं की अधिक भीड़ थी। हमने भी हाथ जोड़कर पूजा की।
हम आश्चर्य में थे कि हम बिन्ध्यवासिनी माता की पूजा कर रहे थे, अर्थात् उस देवी की जो विन्ध्य क्षेत्र में वास करती हैं। नेपाल को कब से विन्ध्य कहा जाने लगा? निश्चय ही इस मन्दिर को बनवानेवाला विन्ध्य क्षेत्र का रहा होगा। बहुत सिद्ध मन्दिर है यह! इच्छा रखें और इच्छापूर्ति के बाद इस मन्दिर में पूजा एवं बलि का भी रिवाज है। परन्तु बलि देने के लिए अलग स्थान निर्धारित है। वह स्थान मन्दिर के एक कोने में है। बलि का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया जाता।
मन्दिर में रोशनी के लिए पीतल के दियों को साफ किया जा रहा था। समूचा परिसर साफ एवं स्वच्छ था। मुख्य मन्दिर के दर्शन के बाद हम ठीक सामने स्थित कलात्मक रूप से निर्मित लक्ष्मीनारायण, सीताराम और राधाकृष्ण मन्दिर पहुँचे। जहाँ तक मुझे याद है, ये तीनों मन्दिर पिछली यात्रा के समय नहीं थे। पीतल से बनी तीनों प्रतिमाएँ स्वर्णिम आभा प्रस्तुत कर रही थीं। मन्दिर एक ही है परन्तु मूर्तियाँ पृथक-पृथक कक्षों में प्रतिष्ठित हैं। इस मन्दिर का पुजारी एक 10 वर्षीय बालक था जो हमें फोटो लेने से मना करता रहा। बातचीत के दौरान उसने मन्दिर की महिमा का खूब बखान किया। यह मन्दिर पैगोडा शैली में बना हुआ है।
अब हम मुख्य मन्दिर की दाईं ओर बने शिव मन्दिर पहुँचे। उसी प्रकार एकदम साफ-सुथरा चमचमाता मन्दिर। शिवलिंग का भी शानदार तरीके से श्रृंगार किया गया था। मन्दिर के ही कुछ पण्डित अनुष्ठान में लगे हुए थे। परन्तु स्वच्छता वहाँ भी थी। पूजा सामग्री करीने से रखी थी। पुजारी से अनुमति लेकर हमने फोटोग्राफी की। दर्शन कर बाहर निकले। इस शिव मन्दिर के ठीक सामने नन्दी की एक प्रतिमा थी जिसके दोनों कान बिल्कुल सीधे थे। यदि शिवजी से कोई मन्नत माँगनी है तो नन्दी के कान में भी धीरे से फुसफसाकर अपनी बात कह सकते हैं। कविता ने जरूर नन्दी के कान में कुछ फुसफुसाया।
कुछ देर हम वहीं घूमते रहे। मन्दिर के चारों ओर अन्नपूर्णा रेन्ज के ऊँचे-ऊँचे पर्वतों का अद्भुत दृश्य दिख रहा था। इसी मन्दिर के सामने से ट्रेकिंगकर सरांगकोट की चढ़ाई प्रारम्भ की जाती है। अब हम सेती नदी देखने के लिए निकले। यह पोखरा की मुख्य नदी है जो शहर के किनारे-किनारे बहती है। आज सुबह हमने सरांगकोट चोटी से भी इस नदी को देखा था। परम्परागत रूप से पर्यटक जिस स्थान से सेती नदी को देखने जाते हैं, हम वहाँ न जाकर काफी समीप से जहाँ दिखती है, वहीं गए। पिछली यात्रा के दौरान हमने इस नदी को बहुत गहरे गॉर्ज में बहते हुए देखा था।
आज हम वहाँ थे जहाँ इस नदी के पानी को रपटा बनाकर रोका गया है। यहाँ इस नदी का प्रवाह तीव्र था। बड़ी जलराशि रपटे के ऊपर से बह रही थी। नदी का पानी चूना पत्थर की चट्टानों से होकर गुजरता है इस कारण इसका रंग सफेद है। इसे स्थानीय लोग लिमका वाटर भी कहते हैं। नेपाल में सेती का अर्थ होता है श्वेत अर्थात् सफेद दूधिया पानी की नदी। खास बात यह है कि यह नदी कहीं अण्डरग्राउण्ड तो कहीं सिर्फ 2 मीटर चौड़ी तो कहीं-कहीं 40 मीटर तक गहरी है। इस नदी के पानी में चूना अधिक है। इसलिए यहाँ के लोग पानी उबालने के बाद फिल्टर से छानकर पीते हैं।
धूप अब तेज हो गई थी। हम वापस होटल के लिए निकल पड़े। भूख भी लग आई थी। ड्राइवर मैक ने बताया कि वह एक पंजाबी रेस्तरां जानता है जहाँ हर प्रकार के भारतीय व्यंजन मिलते हैं और पूर्णतः शाकाहारी भी है। 20-25 मिनट का रास्ता तय करते हुए हम लेक साइड के बाईदाम क्षेत्र में स्थित उसी रेस्तरां में पहुँचे। देशी छौंकवाले व्यंजनों की खुशबू हवा में फैली हुई थी और यह होटल भारतीय पर्यटकों से गुलजार भी था। मुश्किल से ही सही, हमें एक टेबल मिला। आधे घण्टे के इन्तजार के बाद पूर्णतः भारतीय स्वादवाला जायकेदार भोजन आया। आज हम लोगों ने छककर खाना खाया। वापस होटल लौटे।
पोखरा में आठ झीलें हैं फीवा, बेगनास, रूपा, मैदी, दीपगंगा, गुंदे, माल्दी और खास्त। दो घण्टे आराम के बाद दोपहर करीब 3:00 बजे हम बेगनास ताल के लिए निकल पड़े। एक घण्टे की यात्रा के बाद हम ताल के सामने थे। पिछली यात्रा के दौरान 18 वर्ष पूर्व यह सारा क्षेत्र वीरान था। अब यहाँ छोटा सा बाजार है। हमने एक घण्टे बोटिंग की। प्रकृति को बहुत नज़दीक से देखा। चमकती झील की सतह पर आसपास के पहाड़ों का स्पष्ट प्रतिबिम्ब दिख रहा था। इस झील का पानी भी डल झील के मुकाबले बहुत साफ था। कुछ देर तक किनारे टहलते रहे। शाम के 6:00 बज चुके थे। हम वापस लौटे।
आज का दिन बहुत व्यस्त रहा। सुबह साढ़े तीन बजे उठना, फिर ट्रेकिंग, पोखरा के समस्त साइट सीन और अन्त में बेगनास। सारा बदन टूट रहा था। वापस लौटते समय, होटल कान्तिपुर परिसर में ही एक मसाज पार्लर दिखा – अन्नपूर्णा मसाज एण्ड ब्यूटी केयर स्पा। होटल कान्तिपुर के प्रबन्धन ने पहले दिन ही हमें इसके बारे में बताया था। यह स्पा आयुर्वेदिक मसाज के लिए विख्यात है। ट्रेकिंग से लौटकर अधिकांश पर्यटक इस स्पा में इस प्रकार का ट्रीटमेन्ट लेते हैं और पूरी तरह रिलैक्स हो जाते हैं। मैंने भी हिम्मत की और पैंतालीस मिनट तक आयुर्वेदिक तेल से बॉडी मसाज कराया। मसाज के अन्तिम क्षणों में तो नींद आ चुकी थी। सारे शरीर में नई स्फूर्ति आ गई। मसाज समाप्त होते-होते तेज भूख भी लग आई थी।
वर्ष 2011 में हम हिमांचल प्रदेश घूमने गए थे। वहाँ हम कुल्लू मनाली, रोहतांग पास, शिमला, कुफरी, नालदेहरा, मशोबरा और तत्तापानी के साथ-साथ चैल भी गए थे। वैसे तो पूरा टूर ही अपने दिमाग में तरोताजा है, परन्तु मशोबरा की खूबसूरत यादें अभी भी दिल को गुदगुदाती हैं।
कुछ सोचने पर समझ में आया कि मशोबरा ही एक ऐसी जगह थी जहाँ हमने अपनी गाड़ी छोड़कर घण्टों पैदल घूमे थे। चीड़ देवदार वृक्षों की छाया, गहरी घाटियाँ, बड़े-बड़े सेब के बागान, साफ सुथरा कस्बा और ताजी सनसनाती हवा! हमने वहीदा रहमान के सेब बागान बेन्डोची को देखा, मिसेज जैन की सॉस, जैम और चटनी बनानेवाले प्लान्ट को देखा, खुशवन्त सिंह के बड़े भाई गुरूबक्श सिंह का बागान “मधुबन” देखा, ऊँची चोटी पर पकौड़े खाए और अंग्रेजीराज के दौरान सैन्य जनरलों के आपसी झगड़े की कहानियाँ भी सुनीं। तब से हमने यह निश्चय किया था कि जहाँ तक हो सके, अधिक से अधिक पैदल घूमेंगे और शहर को समझने की कोशिश करेंगे।
उसी निश्चय के क्रम में आज भी निकले थे। बाजार पूरी तरह सज चुका था। पर्यटकों की वही भीड़। लेक साइड रौशनी से नहाया हुआ था। दोपहर के खाने की याद आ रही थी। हमने उसी पंजाबी रेस्तरां की ओर रुख किया जो हमारे होटल कान्तिपुर से करीब 3 किमी. दूर था। रेस्तरां में फिर वैसी ही भीड़ थी। बाहर आते-आते रात्रि के 10 बज चुके थे। इस समय टैक्सी चालकों में भारी प्रतिस्पर्धा होती है। सभी टैक्सीवाले किसी भी प्रकार से सवारी ढूंढ़ते हैं। ऐसे में एक ड्राइवर से हमारा विवाद भी हुआ। वह झगड़े पर उतारू था। किसी प्रकार हम दूसरी टैक्सी से होटल पहुँचे। बिस्तर पर लेटते ही हम गहरी नींद में थे। पोखरा में यह हमारी आखिरी रात थी। कल सुबह काठमाण्डू के लिए निकलना था।
नेपाल यात्रा का आज पाँचवां दिन था।
छठा दिन: वापस काठमाण्डू की ओर वाया मनकामना
सुबह 5:30 बजे अपने होटल की छत पर सूर्योदय देखने पहुँचे। सरांगकोट के समान तो नहीं, परन्तु यहाँ से भी उगते हुए सूर्य को देखना कम रोमान्चक नहीं था। फिशटेल, धौलागिरी और अन्नपूर्णा-2 चोटियाँ तो स्पष्ट दिख रही थीं। इन नारंगी रंग से पुती चोटियों को देखना न भूलनेवाले क्षण थे। उस समय छत पर बहुत से अन्य पर्यटक भी थे।
नहा धोकर हमने होटल में ही नाश्ता किया और 8:30 बजे तक चेकआउट कर काठमाण्डू के लिए निकल पड़े। पहले सेती नदी की घाटी, फिर मादी नदी और अन्त में मरस्यांग्दी नदी घाटी को पार करते हुए हम 11 बजे तक मुगलिंग पहुँच गए थे। वही खूबसूरत फिज़ाएँ, चमकती पर्वत चोटियाँ, सजी-धजी हरियाली, घने जंगल, धान के खूबसूरत खेत, नदियों में जल का तीव्र प्रवाह। मुगलिंग से 15 मिनट बाद हम कुरिन्तर नामक जगह पर पहुँचे। मनकामना मन्दिर को जानेवाली केबल कार का यह बॉटम स्टेशन है।
कुरिन्तर से तीन-चार कि.मी. पहले से ही सड़क के दोनों तरफ गाडि़यों की कतारें लगी थीं। ट्रैफिक व्यवस्था चरमरा रही थी। पता चला कि शनिवार को नेपाल में साप्ताहिक अवकाश होता है। चूँकि आज शनिवार था, इस कारण मनकामना मन्दिर में दर्शन और बलि चढ़़ानेवाले श्रद्धालु लाखों की संख्या में आते हैं।
हमारे पास टिकट पहले से ही था। हम टिकट की लाइन से तो बच गए परन्तु केबल से जाने के लिए भी लाइन बहुत लम्बी थी। सैकड़ों श्रद्धालु अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे। खैर, डेढ़ घण्टे बाद हमारी बारी आई। केबल कार से त्रिशूली नदी घाटी का दृश्य मन्त्रमुग्ध कर देनेवाला था। हम काफी तेज़ी से ऊपर जा रहे थे।
इस रोपवे का निर्माण एक ऑस्ट्रियाई कम्पनी ने किया है। इसका प्रबन्धन मनकामना दर्शन (प्रा.) लि. करती है। बॉटम स्टेशन बहुत व्यवस्थित था और स्वच्छता का स्तर भी काफी अच्छा था। स्टेशन के चारों ओर के क्षेत्र को एक सुन्दर पार्क के रूप में विकसित किया गया है।
हमारे पास जो टिकट थे वे जारी होने के दिनांक से अगले एक माह तक, किसी भी दिन के लिए वैध थे। यहाँ आनेवाले श्रद्धालुओं के लिए फ्री पार्किंग एवं मनकामना कैफे नाम से एक रेस्तरां भी सन्चालित है। राफ्टिंग समाप्त कर बॉटम स्टेशन के नीचे त्रिशूली नदी से ऊपर चढ़कर हम लोगों ने इसी कैफे में खाना खाया था।
10-12 मिनट में 2.8 कि.मी. की अद्भुत यात्रा पूरी कर हम मनकामना मन्दिर परिसर में पहुँचे। मनकामना मन्दिर तक पहुँचने पर मन्दिर के दक्षिण की ओर त्रिशूली नदी की घाटी तो पश्चिम की ओर मरस्यांग्दी नदी की घाटी भव्य दिख रही थी। दूर मनास्लू-हिमाचली एवं अन्नपूर्णा श्रृंखला की भव्य चोटियाँ अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहीं थीं। मनकामना मन्दिर करीब 400 वर्ष पुराना है और आश्चर्य होता है कि उस पर्वत शिखर पर, जहाँ इन्सान का पहुँचना कठिन था, कैसे यहाँ निर्माण हुआ होगा।
इस परिसर में बहुत अधिक भीड़ थी। हजारों लोग लाइन में लगे थे। करीब-करीब समस्त श्रद्धालुओं के हाथ में मुर्गे अथवा रस्सी से बंधे बकरे थे जिनकी यहाँ बलि चढ़ाई जानी थी। समूचे परिसर में खून बिखरा हुआ था। बहुत सारे नवविवाहित जोड़े भी दर्शनार्थ आए थे। मन्दिर के भीतर जाकर दर्शन करना तो आज असम्भव था। मन्दिर की परिक्रमा की। परिक्रमा करने के दौरान बलि देने का स्थान दिखा। यहाँ बहुत सारे लोग बलि देने का इन्तजार कर रहे थे।
अम्लान भीतर जाकर बलि कैसे दी जाती है, यह देखने की जिद्द कर रहा था। किन्तु मेरी पत्नी उस पर बुरी तरह नाराज़ हो रही थी। मेरे ऊपर भी झल्ला रही थी कि मैं उसे रोक क्यों नहीं रहा। गौतम बुद्ध की जन्मभूमि पर आकर उसे यह भय हो गया था कि यदि बेटे ने यह सब खून-खराबा देख लिया तो वह इस भौतिक संसार से विरक्त होकर सन्यास ले लेगा। और यदि ऐसा हुआ तो उसका वंश कौन चलाएगा…?
पहले जब भी हमारा स्नेह अपनी बेटी ऋचा पर अधिक छलकता, वह हम दोनों को ताना मारता कि माँ! ऋचा बेटी है बेटी! वह तो दूसरे घर चली जाएगी। पाण्डेय वंश तो मैं ही चलाऊँगा। मेरी पत्नी उस वक्त तो बेटे पर नाराज होती परन्तु आज उसके द्वारा कहे जाने वाले इन्हीं शब्दों का वास्ता दे रही थी। खैर, माँ बेटे की कशमकश में जीत माँ की हुई।
17वीं सदी में बने इस मन्दिर के बारे में मान्यता है कि मनकामना देवी के दर्शन और पूजा के उपरान्त प्रत्येक भक्त की समस्त मुरादें पूरी हो जाती हैं। किम्वदन्तियों के अनुसार, तब गोरखा के राजा रामशाह की रानी को बहुत सारी दैवीय शक्तियाँ प्राप्त थीं। इन शक्तियों के बारे में सिर्फ उनका एक भक्त, लखन थापा, जानता था। अचानक एक दिन राजा ने रानी को माँ भगवती के अवतार में देख लिया। उस समय लखन, सिंह के रूप में था। इस भेद को जान लेने के बाद राजा की एक दिन अचानक मृत्यु हो गई। परम्परा अनुसार, राजा के शव के साथ रानी चिता पर सती हो गई। परन्तु सती होने के पहले रानी ने लखन को आश्वस्त किया कि वह जल्दी ही किसी अन्य रूप में प्रकट होंगी।
छः माह के बाद खेत की जुताई के दौरान एक किसान को एक चट्टान मिली जहाँ से रक्त और दूध की धारा प्रवाहित हो रही थी। इस घटना की सूचना जैसे ही लखन थापा को मिली वह भागता हुआ उस स्थान पर पहुँचा और हिन्दू तान्त्रिक विधि-विधान से पूजा करने लगा। पूजा खत्म होते ही रक्त और दूध का बहना बन्द हो गया। और इसी स्थान पर आज मनकामना मन्दिर बना हुआ है। प्रथा के अनुसार, इसी लखन थापा के वंशज, जो मगार जाति के हैं, ही मन्दिर के पुजारी हो सकते हैं। उनका यहाँ एकाधिकार है।
इस मन्दिर में माँ दुर्गा के भगवती रूप की उपासना की जाती है। मन्दिर पैगोडा शैली में बना है। चोटी के दूसरी ओर गहरी घाटी में गोरखा शहर दिख रहा था। एक श्रद्धालु ने गोरखा एवं गुरखा का शाब्दिक अन्तर बताया। गोरखा शब्द इस शहर का नाम है जबकि यहाँ के निवासियों को गुरखा कहा जाता है। उस ने यह भी बताया कि यहाँ समस्त नवविवाहित जोड़े पुत्र (पुत्री नहीं) की कामना के लिए आते हैं। नेपाल का वैसे प्रत्येक मन्दिर किसी न किसी हिन्दू पुराण कथा अथवा आस्था से जुड़ा हुआ है जो अपने इष्टदेव या देवी की चमत्कारिक शक्तियों का गुणगान करता है।
करीब एक घण्टे परिसर में रुकने, प्रतिमा का दूर से दर्शन करने, घूमने और कुछ खरीदारी करने के बाद हम लौटने को तैयार थे। मन्दिर के सामने केवल एक ही गली है जिसके दोनों तरफ 70-72 दुकानें हैं। इन दुकानों पर प्रसाद, नारियल, चुनरी, खील, बतासे, धूप, दीप के अलावा चाय, नाश्ता, खाना, पानी सब कुछ था। प्रत्येक दुकान पर मदिरा अवश्य दिखती है जिसे यहाँ लोग माँ भगवती पर चढ़ाते हैं।
अब हम 1302 मीटर नीचे उतरनेवाले थे। यह रोपवे बहुत सीधी चढा़ईवाला है। नीचे उतरते वक्त हमारे शरीर में एक सिहरन सी थी। परन्तु यह कम्पनी हमें सौ फीसदी सुरक्षा की गारण्टी देती है। प्रत्येक यात्री को एक लाख नेपाली रुपए का बीमा भी निश्चित है। बहुत सारे श्रद्धालुओं के हाथों में बलि चढ़ाए गए मुर्गों और बकरों के मांस से भरे पॉलीथिन बैग थे। कई के बैग से तो रक्त भी टपक रहा था। दस मिनट की रोमान्चक यात्रा के बाद हम नीचे थे। वहीं एक पट्टिका पर लिखा था कि इस रोपवे का उद्घाटन 24 नवम्बर 1998 को नेपाल के तत्कालीन युवराज दीपेन्द्र वीर विक्रम शाह ने किया था। दोपहर के दो बज चुके थे। भोजन के लिए हम पुनः उसी मनकामना कैफे में पहुँचे। होटल के मैनेजर ने हमें पहचान लिया। बड़े जतन और उत्साह से उसने हमें भोजन कराया। हमने फिर नेपाली थाली ही खाई।
थोड़ी देर रुकने के बाद करीब 3 बजे हम काठमाण्डू के लिए निकल पड़े। रास्ते में ताज़ी लीची बिक रही थी। पर यह उतनी मीठी नहीं थी। ढाई घण्टे की यात्रा के बाद हम काठमाण्डू स्थित अपने होटल रामा इन. में थे। वही दोनों कमरे मिले जिनमें हम तीन दिन पहले रुके थे। इस समय काठमाण्डू में बारिश हो रही थी। थोड़ी देर हमने होटल में ही आराम किया।
करीब 7 बजे फिर ठमेल बाजार के दूसरे क्षेत्र फ्रीक स्ट्रीट की ओर पैदल घूमने निकल गए। यह क्षेत्र झोछेन टोल नाम से भी जाना जाता है। यह काठमाण्डू आनेवाले पर्यटकों के ठहरने का पहला ठौर ठिकाना था। 1960 और 1970 के दशकों में नेपाल में आनेवाले हिप्पियों के कारण यह मशहूर था। आधे घण्टे बाद ही वापस लौटना पड़ा क्योंकि वर्षा फिर शुरू हो गई थी। आज होटल में ही डिनर लिया और महाभारत सीरियल देखा। डिनर के बाद नारायणहिति महल के आसपास चहलकदमी करते रहे। तब तक वर्षा बन्द हो चुकी थी। यह क्षेत्र कानून-व्यवस्था की दृष्टि से बहुत सुरक्षित क्षेत्र है। हमारी आज नेपाल में अन्तिम रात्रि थी। कल सुबह स्वयंभू मन्दिर, दरबार स्क्वायर देखने के बाद दोपहर 1:30 बजे तक एयरपोर्ट पर रिपोर्ट भी करना थी। उस हिसाब से पैकिंग फाइनल करने के बाद हम 10:30 बजे सो गए।
नेपाल यात्रा का आज छठा दिन था।
सातवाँ दिन: काठमाण्डू शहर में
हम सुबह 6 बजे सोकर उठे। जल्दी-जल्दी नहा धोकर तैयार हुए, पैकिंग की, वहीं रेस्तरां में नाश्ता किया और 9 बजे तक होटल से चेकआउट कर लिया। नारायणहिति महल के मेनगेट पर पहुँचने पर कर्मचारियों ने बताया कि यह पर्यटकों के लिए सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक खुला रहता है। आज हमें काठमाण्डू दरबार स्क्वायर और स्वयंभूनाथ का मन्दिर भी देखना था। फिर डेढ़ बजे एयरपोर्ट पर रिपोर्ट करना था। अब हम महल को देख पाने में असमर्थ थे। वहीं थोड़ी देर रुककर इसके बारे में जानने की कोशिश की।
वर्ष 1888 से 2008 तक यह नेपाल के राजाओं का राजमहल रहा है। इसके पहले राजपरिवार काठमाण्डू दरबार स्क्वायर में निवास करता था। इसी नारायणहिति महल में 1 जून 2001 को शाही हत्याकाण्ड में राजा वीरेन्द्र, रानी ऐश्वर्या और राजपरिवार के अन्य सभी सदस्यों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। बाद में इस हत्याकाण्ड को कथित रूप से अन्जाम देनेवाले युवराज दीपेन्द्र ने भी स्वयं को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। राजा वीरेन्द्र के चचेरे भाई ज्ञानेन्द्र अगले राजा बने। इस हत्याकाण्ड के दौरान चलाए गए बुलेट के निशान आज भी महल की दीवारों पर देखे जा सकते हैं। वर्ष 2008 में माओवादी नेता पुष्प कमल दहल “प्रचण्ड” ने जब चुनाव के बाद नेपाल के प्रधानमन्त्री का पद सम्भाला, तब नेपाल के हिन्दू राजशाही का अन्त कर नेपाल को धर्मनिरपेक्ष गणतन्त्र घोषित कर दिया गया। राजा ज्ञानेन्द्र को नारायणहिति महल छोड़ने के लिए 15 दिन का समय मिला। साथ ही, इस महल को दो वर्ष के भीतर एक म्यूजियम बना दिया गया। तीस हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस महल परिसर में नारायण का एक मन्दिर है। दक्षिण में बनी दरबार रोड से महल का जो हिस्सा दिखाई देता है उसे 60 के दशक में राजा महेन्द्र ने बनवाया था।
हम स्वयंभूनाथ मन्दिर की ओर बढ़ चले जो हमारे होटल से बमुश्किल दो-ढाई कि.मी. दूर था। विष्णुमती नदी पार करते ही मन्दिर के नीचे पहुँच गए। पहले सीढि़याँ चढ़़कर ऊपर पहुँचने का रास्ता मिला। परन्तु समय की कमी के कारण हमने दूसरी तरफ वाला रास्ता चुना जहाँ मात्र 150 से 160 सीढि़याँ चढ़नी पड़ीं। वास्तव में, स्वयंभू मन्दिर एक टीले पर बना हुआ है। स्वयंभूपुराण के अनुसार, उस समय यह टीला पानी से घिरा एक द्वीप हुआ करता था जब समूची काठमाण्डू घाटी पानी भरने के कारण एक झील बनी हुई थी। वैज्ञानिक शोध इस तथ्य की पुष्टि भी करते हैं। तब इस झील के समूचे क्षेत्र में कमल के फूल खिला करते थे। झील का नाम नागदाह था क्योंकि यह झील पानी में रहनेवाले भयानक नागों का बसेरा हुआ करती थी। मन्जूश्री (बुद्धि एवं विद्या के देवता) ने अपनी तलवार, चन्द्रहास, से चोभर नामक स्थान के पास चट्टान को काट दिया। इस कारण झील का सारा पानी बह गया और इस पूरे झील क्षेत्र में आज काठमाण्डू नगर बसा हुआ है। मन्जूश्री ने यहाँ एक नगर, मन्जूपट्टन, बसाया और धर्म की स्थापना की।
गोपाल वंशावली के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से इस झील का किनारा काटकर इसका पानी गहरी खाइयों में बहा दिया था और इस समूचे क्षेत्र को गाय चरानेवाले खानाबदोश गोपालवंशी लोगों को सौंप दिया था। स्वयंभू का अर्थ है ‘स्वयं उत्पन्न होना’। स्पष्ट है कि झील के समस्त जल के बह जाने के कारण इस द्वीप का निर्माण स्वयं हुआ। इस मन्दिर का स्तूप नेपाल स्थित प्राचीनतम स्तूप है। इसके लिखित साक्ष्य 13वीं सदी में निर्मित होने का तथ्य प्रस्तुत करते हैं। जहाँ बौद्धनाथ स्तूप तिब्बती बौद्धों का मुख्य आराधना स्थल है, वहीं स्वयंभूनाथ, नेपाली बौद्धों से जुड़ा हुआ है। हिन्दू धर्मावलम्बी भी इस स्थान को उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक पूजते हैं। इस मन्दिर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए वर्ष 1979 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर सूची में स्थान दिया है।
वर्ष 1346 में बंगाल के सुल्तान शम्शुद्दीन ने इस मन्दिर पर आक्रमण कर इसकी बहुत सारी कलाकृतियों को नष्ट कर दिया था। उसने स्तूप को भी इस लालच में कि इसमें बहुत सारा स्वर्ण छिपाया गया है, खुलवा दिया था। मुख्य द्वार बहुत अलंकारिक है। भीतर प्रवेश करते ही बुद्ध की तीन प्रतिमाएँ मिलीं। सीढि़यों से ऊपर चढ़ते समय छोटी-छोटी दुकानों के अतिरिक्त, छोटे-छोटे कुछ गोम्पा और मठ भी थे। ऊपर मन्दिर तक पहुँचने के लिए हमें 85 मीटर की चढ़ाई करनी पड़ी।
यहाँ बन्दरों का काफी आतंक है। ये चारों ओर दिख भी रहे थे। इन बन्दरों के कारण विदेशी इस मन्दिर को मंकी टेम्पल भी कहते हैं। स्वयंभूनाथ में और इसके आसपास के बन्दरों को बहुत पवित्र माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस द्वीप का निर्माण करने वाले बुद्धि और विद्या के देवता, मन्जूश्री, के सिर के बाल बढ़ जाने के कारण उनमें जुएँ पड़ गई थीं। यही जुएँ बाद में इन बन्दरों के रूप में परिवर्तित हो गईं। चढ़ते समय बहुत सारे प्रार्थनाचक्र भी दिखे। ऊपर पहुँचते ही हमें वज्रधातु मण्डल दिखा। कहते हैं कि यह वही तलवार है जिसकी धार से मन्जूश्री ने, काठमाण्डू झील के किनारे पर चट्टान को काटकर जलराशि को बहा दिया था। यहाँ बहुत सारे घी के दीप जलाए जा रहे थे। इसके पीछे एक हॉल बना हुआ था जिसमें श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठान आदि कर रहे थे।
मुख्य स्तूप एकदम सफेद पुता हुआ था। इसके ऊपर बुद्ध की चतुर्मुखी आकृति बनी है जिसके ऊपर चारों दिशाओं को देखती उनकी आँखें बनाई गई हैं। इसके पीछे एक और बौद्ध स्तूप दिखा। इसमें भगवान बुद्ध की पीतल की एक बड़ी मूर्ति स्थापित है। एक बड़ा प्रार्थनाचक्र भी बना था। इसके पीछे एक प्रार्थना हॉल था जिसमें एक साथ करीब 20 बौद्ध उपासक मन्त्रोच्चार कर रहे थे। कुछ देर तक हम वहाँ बैठे परन्तु कुछ अधिक समझ में नहीं आया। यह मन्दिर बहुत समृद्ध था और यहाँ बहुत सारी पीतल की चमचमाती मूर्तियाँ स्थापित हैं। यहाँ के अधिकांश भवन राजा प्रतापमल्ल द्वारा 17वीं सदी में बनाए गए हैं।
इस स्तूप का मई 2010 में पूर्णरूप से जीर्णोद्धार कराया गया है। तब इस स्तूप में 20 किलो सोना भी मढ़वाया गया था। इस जीर्णोद्धार के लिए धनराशि “द तिबेतन निंगमा मेडिटेशन सेन्टर ऑफ कैलिफोर्निया” द्वारा दी गई थी। इसके पहले इसके जीर्णोद्धार का कार्य 89 वर्ष पूर्व सन् 1921 में हुआ था। 1500 वर्षों के इतिहास में यह 15वां जीर्णोद्धार था।
करीब एक घण्टा रुकने के बाद हम नीचे उतरे। नीचे उतरने के बाद एक पानी के हौज़ के पास पहुँचे। हौज़ के बीचो-बीच एक छोटा चबूतरा बना था जिसके ऊपर बुद्ध की एक छोटी सी मूर्ति थी। पास में ही सिक्के बिक रहे थे। उछाले गए सिक्के अगर इस चबूतरे पर टिक पाए तो समझो मन्नत पूरी हो जाएगी, ऐसी मान्यता है। वैसे हमारे द्वारा उछाला गया कोई सिक्का वहाँ टिक नहीं पाया।अब हम काठमाण्डू दरबार स्क्वायर की ओर बढ़ चले थे जो वहाँ से मात्र 10-15 मिनट की दूरी पर था। पूरे रास्ते घनी आबादी थी और ट्रैफिक भी अनियन्त्रित था। काफी मशक्कत के बाद हम वहाँ पहुँच सके।
काष्ठमण्डप के पास स्थित टिकट घर से हमने टिकट लिया और नक्शे के मुताबिक आगे बढ़े। यह पूरा परिसर दरबार अथवा महल के सामने अवस्थित होने के कारण दरबार स्क्वायर कहलाता है। इसे हनुमान ढोका दरबार स्क्वायर भी कहते हैं क्योंकि राजा प्रतापमल्ल ने वर्ष 1672 में राजमहल के प्रवेश द्वार पर हनुमानजी की एक मूर्ति स्थापित की थी। काठमाण्डू शहर के बीचो-बीच स्थित यह स्क्वायर शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है। सभी त्यौहार सार्वजनिक रूप से यहीं मनाए जाते हैं। यहाँ बने मन्दिर एवं भवन हिन्दू और बौद्ध दोनों धर्मावलम्बियों द्वारा समान रूप से पूजे जाते हैं। इस स्क्वायर के समस्त भवन मल्ल, शाह और राणा वंश के राजाओं तथा सरदारों द्वारा बनवाए गए हैं। कहते हैं कि इस परिसर की स्थापना लिच्छवी वंश के राजाओं ने की थी। परन्तु राजा पृथ्वीनारायण शाह ने जब वर्ष 1770 में बसन्तपुर दरबार बनवाया तब से इस स्थान ने राजशाही की महत्ता प्राप्त कर ली थी।
पृथ्वीनारायण शाह द्वारा एकीकृत नेपाल की स्थापना के बाद वर्ष 1768 से वर्ष 1888 तक समस्त राजाओं ने इसी महल में निवास किया है। इसके बाद ही नए राजमहल नारायणहिति में राजाओं ने रहना प्रारम्भ किया। यहाँ के सभी भवन एवं मन्दिर 12वीं से 18वीं सदी के मध्य बने हैं। इसी कारण यूनेस्को ने इस पूरे क्षेत्र को वर्ष 1979 में विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया है।
सबसे पहले हम काष्ठमण्डप पहुँचे। पूर्णतः लकड़ी से बना यह भवन सार्वजनिक हॉल के रूप में काम आता है। बीचो-बीच सन्त गोरखनाथ की प्रतिमा थी जबकि चारों कोने में गणेश की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। कहते हैं कि 12वीं सदी में बना यह भवन एक ही वृक्ष की लकडियों से बना है। यह भवन लकडि़यों पर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।
इसके बाद हम कुमारी घर पहुँचे। नेपाल की सबसे प्रसिद्ध शाही कुमारी यहीं रहती हैं। लाल ईंट से बने इस तीन मन्जिले भवन की लकडि़यों पर नक्काशी का काम उत्कृष्ट था। काले पेन्ट से पुते इस भवन की बालकनी और खिड़कियाँ बहुत खूबसूरत हैं। दीवारें चमचमा रही थीं। हम आँगन तक पहुँचे। इसके आगे जाने की मनाही है। अगर तकदीर होती तो कुमारी तीसरी मन्जिल की खिड़कियों से झाँकती हमें दिख जातीं। मगर ऐसा नहीं हुआ। कहते हैं कि इस भवन का निर्माण वर्ष 1757 में राजा जयप्रकाश मल्ल ने करवाया था।
कुमारी घर से बाहर निकलते ही सफेद रंग का शानदार भवन दिखा। यूरोपीय शैली में बना यह भवन सिंह दरबार है जिसे गद्दी बैठक भी कहते हैं। इसे वर्ष 1901 में प्रधानमंत्री चन्द्रशमशेर राणा ने बनवाया था। नेपाल सरकार का सचिवालय इसी भवन में है। प्रधानमन्त्री कार्यालय भी यहीं है। कहते हैं कि सिंह दरबार का स्थापत्य नारायणहिति महल के मुकाबले अधिक आकर्षक है। इसके बाद हम माजू देवल पहुँचे। एक के ऊपर एक बने नौ चबूतरों पर स्थित यह मन्दिर इस क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय भवन है। पर्यटकों की भारी भीड़ थी। इसके ऊपर पहुँचने पर आसपास के समस्त स्मारकों एवं मन्दिरों का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। हम ऊपर आधे घण्टे आराम से बैठे रहे। इस भवन में लकड़ी के दरवाजे, नक्काशीदार खिड़कियाँ देखने लायक थीं।
फिर हम कालभैरव की मूर्ति के पास पहुँचे। छः हाथोंवाले भगवान शिव अपने रौद्र रूप में थे। बहुत सारे श्रद्धालु पूजा अर्चना में लगे थे। कहते हैं, इस प्रतिमा का उपयोग झूठ पकड़ने के लिए किया जाता रहा है। मान्यता है कि कोई भी अपराधी कालभैरव की शरण में आकर झूठ नहीं बोल सकता। यदि उसने झूठ बोला तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी। इस मूर्ति की स्थापना राजा प्रताप मल्ल ने 17वीं सदी में कराई थी।
कालभैरव के पास ही तलेजू (दुर्गा) मन्दिर भी है। पैगोडा शैली में निर्मित इस तीन मन्जिले मन्दिर को सन् 1564 में राजा महेन्द्र मल्ल ने बनवाया था। कहते हैं कि उन दिनों राजा के आदेशानुसार इस 36.6 मीटर ऊँचे मन्दिर से ऊँचा और कोई भवन पूरे मल्ल राजाओं के काल में नहीं बनाया गया। इस मन्दिर से ऊँचा भवन बनाना कुछ वर्षों पूर्व तक अपशकुन माना जाता रहा है। यह मन्दिर आम जनता के लिए बन्द रहता है। दशैन (दशहरे) के समय कुछ दिनों के लिए सिर्फ हिन्दुओं के दर्शानार्थ खोला जाता है। तलेजू भवानीदेवी मूलतः दक्षिण भारत की देवी हैं जिसे मल्ल राजवंश के राजाओं ने अपनी कुलदेवी के रूप में स्वीकार कर लिया था। बाद में भक्तपुर और पाटन में भी इनके मन्दिर बने। इस देवी के सम्मान में तीनों स्थानों पर तलेजू घण्टा भी है।
अन्त में हम पहुँचे यहाँ के सर्वाधिक महत्वपूर्ण भवन हनुमान ढोका। मुख्य द्वार के पास एक खम्भे के ऊपर चबूतरे पर सिन्दूरी रंग से पुती हनुमानजी की एक मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति की स्थापना 17वीं सदी में राजा प्रताप मल्ल ने करवाया था। मूर्ति के ऊपर एक छतरी भी लगी है। इसके ठीक बगल में प्रवेश द्वार पर दो सिंह की मूर्तियाँ स्थापित हैं। प्रवेश द्वार से प्रवेश करते समय दाईं तरफवाले सिंह पर शिव एवं बाईं तरफवाले सिंह पर पार्वतीजी सवार हैं।
टिकट लेकर हमने इस महल में प्रवेश किया। आज की तारीख में यह सम्पूर्ण महल एक संग्रहालय में तब्दील किया जा चुका है। आरम्भ में राजा त्रिभुवन की व्यक्तिगत वस्तुएँ रखी गई हैं। उन्हें मिले उपहारों, हथियारों, उस समय प्रचलित सिक्कों, फोटोग्राफों, पोशाकों को आम जनता के प्रदर्शन के लिए रखा गया है। राजा महेन्द्र के जीवनचित्र को अगले खण्ड में प्रदर्शित किया गया है। राजा महेन्द्र के विवाह और राज्यारोहण से सम्बन्धित सामग्री अधिक आकर्षक लगी। अब हम बसन्तपुर दरबार, जिसे नौताल दरबार भी कहा जाता है, पहुँचे। वहाँ बैठे गाइड ने हमें ऊपर चढ़ने का संकेत किया। एक-एक करके हम 113 सर्पिल सीढि़याँ चढ़ते हुए नौ मन्जिल ऊपर आ गए। सनसनाती तेज हवा ने हमारी सारी थकावट एक झटके में दूर कर दी। सारा महल लकडि़यों का बना हुआ है। कमरे काफी छोटे-छोटे थे और छत भी काफी नीचा था। यहाँ से पूरा काठमाण्डू नगर दिखाई पड़ रहा था।
कहते हैं कि इसकी पहली मन्जिल पर समस्त मल्ल राजाओं का जन्म हुआ है। दूसरी मन्जिल से वे आम जनता को दर्शन देते थे। तीसरी मन्जिल पर वे रानियों के साथ बैठकर नृत्य देखा करते थे और चौथी मन्जिल से वे प्रतिदिन भोजन करने के पहले यह सुनिश्चित करते थे कि नगर में स्थित प्रत्येक घर से धुआँ उठ रहा है अथवा नहीं। धुआँ उठने का अर्थ था कि उनके घर खाना बन रहा है। यदि किसी घर से धुआँ उठता न दिखे तो राजा उसके घर अनाज भिजवाते थे। इस बसन्तपुर दरबार की ऊपरी मन्जि़लों का निर्माण वर्ष 1770 में राजा पृथ्वीनारायण शाह ने करवाया था।
नौताल से निकलकर हम आगे बढ़े। यहाँ राजा वीरेन्द्र वीर विक्रम शाह से सम्बन्धित व्यक्तिगत वस्तुओं को प्रदर्शन के लिए रखा गया है। यह खण्ड काफी बड़ा था। इसके अन्तिम हिस्से में शाही हत्याकाण्ड के समय की तस्वीरें देखना बहुत दुःखदायी था।
नीचे उतरकर हम एक बड़े चौक (आँगन) में आ गए जिसे नेसल चौक कहते हैं। यहाँ इस प्रकार के 10 आँगन और भी हैं। इसी नेसल चौक में नेपाल के सारे राजाओं के राज्यारोहण संस्कार सम्पन्न हुए हैं। आँगन में एक तरफ राजा की शाही पालकी रखी हुई है। वहीं पास में एक और पालकी थी जिसपर शाही हत्याकाण्ड के बाद महारानी ऐशवर्या की अर्थी निकाली गई थी। दो घण्टे दरबार स्क्वायर क्षेत्र को देखने के बाद हम नेसल चौक से बाहर आए। समस्त मन्दिरों पर एक निगाह डाली और अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गए।
नेपाल की समस्त सांस्कृतिक विरासत काठमाण्डू घाटी में ही संजोकर रखी गई है जिसे हम शुद्ध नेपाली शैली कह सकते हैं। वैसे तराई के क्षेत्रों में जनकपुर और लुम्बिनी में भी ऐसी धरोहरें संरक्षित हैं परन्तु इनपर भारतीय शैली का प्रभाव अधिक है। वैसे तो काठमाण्डू घाटी में चार स्थानों- यथा काठमाण्डू, पाटन, भक्तपुर और कीर्तिपुर में दरबार स्क्वायर हैं परन्तु पुराने शहर का यह दरबार स्क्वायर सर्वाधिक प्रभावशाली और क्षेत्रफल में सबसे बड़ा है। कहा जाता है कि जैसे ही इस क्षेत्र में कोई भवन या स्मारक बनता था, शेष तीनों स्थानों पर इसकी तुरन्त नकल कर ली जाती। हमने कीर्तिपुर को छोड़कर तीनों स्क्वायर देखे। शैली और यहाँ तक कि इन भवनों के नाम भी करीब-करीब एक ही हैं। तीनों स्थानों पर तलेजू मन्दिर, तलेजू घण्टा, राजमहल, राजा प्रताप मल्ल, भूपतीन्द्रनाथ की मूर्ति एक जैसी ही है। हाँ, तीनों स्थानों पर हजारों कबूतर भी हैं। वैसे कहते हैं कि पूरे नेपाल में कबूतरों की संख्या यहाँ की जनसंख्या के मुकाबले अधिक है।
हम अब त्रिभुवन अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर बढ़ रहे थे। नेपाल की यह मेरी तीसरी यात्रा है। 18 वर्ष पूर्व, विवाह के बाद अपनी पत्नी के साथ और 15 वर्ष पूर्व अपने माता पिता, बड़े भाई और परिवारजन के साथ घूम चुका हूँ। परन्तु इस बार नेपाल में जैसे एक पीढ़ी ने करवट ले ली है। नेपाल एक हिन्दू राजतन्त्र से आज एक धर्मनिरपेक्ष गणतन्त्र में परिवर्तित हो चुका है। माओवादी हिंसा अब समाप्त हो चुकी है। नेपाल पुनः प्रगति के पथ पर अग्रसर है। पूरी काठमाण्डू घाटी में वृहद् पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है। हमारे ड्राइवर मैक ने बताया कि आप लोग दो-तीन साल बाद आना, काठमाण्डू बदल चुका होगा।
भारत के साथ बिगड़ चुके सम्बन्ध अब पुनः सुधार की ओर हैं। भारतीय और नेपाली नागरिक एक दूसरे के देश में बिना पासपोर्ट आ-जा सकते हैं। बिना किसी वैधानिक रजिस्ट्रेशन के नेपाली नागरिक भारत में काम धन्धा भी कर सकते हैं। आज भारतीय सेना में 7 गोरखा रेजिमेन्ट हैं जिनमें अधिकांश सैनिक नेपाली नागरिक हैं।
अभी इन्हीं विचारों में मग्न ही था कि हमारी गाड़ी पशुपतिनाथ परिसर के सामने से निकली। सिर स्वतःस्फूर्त श्रद्धावनत हो गया। नेपाल में तीसरी बार तो हो आया परन्तु बहुत सारी इच्छाएँ अभी भी हृदय को उद्वेलित कर रही हैं। माता जानकी की जन्मस्थली, जनकपुर, घूमना अभी शेष है। विश्व को शान्ति और अहिंसा का संदेश देनेवाले गौतम बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी की पावन धरती को मैं अभी तक नमन नहीं कर पाया हूँ। त्रिशूली नदी से राफ्टिंग करते हुए चितवन नेशनल पार्क तक जाने की इच्छा अब बलवती हो चुकी है। एवरेस्ट बेसकैम्प तक 14 दिन की ट्रेकिंग करने की इच्छा जन्म ले रही है। बांदीपुर, गोरखा, चांगूनारायण मैं अभी तक नहीं पहुँच पाया हूँ।
हिन्दू मतावलम्बी होने के कारण एक बड़ी इच्छा कैलाश मानसरोवर जाने की है। और इसके लिए तो नेपाल आना ही पडे़गा। नेपाल भगवान शिव के पौराणिक निवास स्थान कैलाश मानसरोवर का प्रवेश द्वार भी है।
मेरी पत्नी को विश्वास है कि मेरी बेटी ऋचा का जन्म बाबा पशुपतिनाथ का ही प्रसाद है। इस कारण मेरी अन्तरात्मा पशुपतिनाथ मन्दिर से जुड़ी है, जुड़ी रहेगी और भविष्य में भी मैं इस मन्दिर तक आने का मोह कभी छोड़ नहीं पाऊँगा…………!